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मंगलवार, 1 जुलाई 2014

लोकतंत्र का अर्थ बदलने लगा है: संजय कॉक


डाक्यूमेंटरी फिल्मकार संजय काक से उनकी नवीनतम फिल्म माटी के लाल (रेड एंट ड्रीम) के बहाने आज के राजनैतिक और सामाजिक मुद्दों पर जितेन्द्र कुमार की बातचीत..
संजय कॉक 
‘माटी के लाल’ फिल्म देश के विभिन्न हिस्सों में चल रही राजनीतिक उथल-पुथल को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है। हालांकि यह प्रश्न थोड़ा अटपटा है, फिर भी मैं पूछना चाहता हूं कि ‘माटी के लाल’ फिल्म का आइडिया आपके दिमाग में कैसे आया, अनायास या आपकी लंबी तैयारी का हिस्सा था?

कुछ सालों से मध्य भारत खासकर बस्तर, छत्तीसगढ़ में जो चल रहा है उसे देखकर कुछ लोगों को लगता है कि यह अपने आप ही हवा में पैदा हो गया है। इसका कोई इतिहास नहीं है। अखबारों में देखकर और सुनकर ऐसा लगता है कि माओवादी इन जंगलों में आए और बगावत शुरू हो गई या ज्यादा से ज्यादा कुछ सोच लिया तो कह देंगे कि इनका नेपाल के माओवादियों से कोई रिश्ता है! तो बात वहां से शुरू हुई कि भारत में क्रांतिकारी संभावनाएं कहां से पैदा होती हैं या क्रांति का इतिहास भारत में कहां से शुरू होता है। हम पाते हैं कि क्रांति की बात इस देश में 1947 से शुरू नहीं होती है, बल्कि उससे पहले भी इसकी बात होती रही है। 1947 के बाद हर साल किसी न किसी रूप में इस पर बात होती रही है। इसलिए जब लोग कहते हैं कि यह फिल्म क्रांतिकारी संभावनाओं पर एक दस्तावेज है, तो संभवत: इसलिए कि हमारी कोशिश यह थी कि हम कुछ ऐसी चीजों को जोड़ें जो हमें यह समझने में मदद करें कि इस देश में क्रांति की संभावना की बात सिर्फ माओवादियों के हाथ में ही नहीं है, बल्कि जो लोग उड़ीसा के नियमगिरी में खनन के खिलाफलड़ रहे हैं वो भी अपने को क्रांतिकारी कहते हैं, और जो पंजाब में मजदूरों-किसानों के साथ लड़ रहे हैं वो भी अपने को क्रांतिकारी कहते हैं। इसलिए इस फिल्म में उस इतिहास को दोहराने की बात नहीं थी, बल्कि क्रांति की संभावना तलाशने की एक कोशिश थी कि वो क्या है, उसके सूत्र क्या हैं।
आपने 1995-96 में एक फिल्म बनाई थी ‘वन वीपन’ (एकलौता हथियार), जिसमें वोट डालने में ही लोगों को अपनी सारी समस्याओं का समाधान दिखता है, उसके बाद 1999 में नर्मदा घाटी में चल रहे संघर्ष पर ‘पानी पे लिखा’ (वर्ड्स ऑन वाटर) फिल्म बनाई और 2006-07 में ‘जश्न-ए-आजादी’, जो कश्मीर के बारे में है। ‘माटी के लाल’ (रेड एंट ड्रीम) जो इस सीरीज की चौथी फिल्म है, इन में आपस में कहीं न कहीं कोई तार जुड़ा हुआ है?
आप बिल्कुल सही समझ रहे हैं, वन वीपन 25-30 मिनट की छोटी सी फिल्म थी, जो कॉलेज के विद्यार्थियों को बताने के लिए बनाई गई थी और लोकतंत्र इसकी विषयवस्तु थी। यह फिल्म आजादी की 50वीं वर्षगांठ पर बनाने के लिए दी गई थी। इसे दो राज्यों-तमिलनाडु और पंजाब के दलित एक्टिविस्टों से चुनाव से पहले और बाद में बात करने के बाद बनाया गया था। फिल्म बनाने के दौरान पता चला कि लोकतंत्र का अर्थ बदलने लगा है या फिर बदलवाया जा रहा है। उस दौरान मुझे यह भी समझने में मदद मिली कि लोगों और राजसत्ता के बीच रिश्ता क्या है, लोगों की समस्याओं की सुनवाई कहां होती है। जिसे हम लोकतंत्र कहते हैं उसमें लोगों की बात सुनी जाती है या नहीं? जब हमने 1999-2000 में वर्ड्स ऑन वाटर (पानी पे लिखा) बनाई तो मेरी समझ से वह फिल्म कहीं भी बन सकती थी। मणिपुर में बन सकती थी, कश्मीर में बन सकती थी या फिर कहीं और भी बन सकती थी। लेकिन नर्मदा को हमने इसलिए चुना, क्योंकि उसका एक लंबा इतिहास था, बहुत ही साफ बातें कह रहे थे वे लोग। आंदोलनकारियों के तर्क स्पष्ट थे, क्योंकि वे लोग अहिंसक तरीके से अपनी बात कह रहे थे। इसलिए मुझे लगता था कि जब कहीं हिंसा हो रही होती है और बंदूक का प्रयोग हो रहा होता है तो तात्कालिक रूप से उन मसलों का आकलन करना मुश्किल हो जाता है। हिंसा का प्रभाव काफी ज्यादा होता है। इसलिए मैंने सोचा कि नर्मदा घाटी में जो हो रहा है, उसे ही देखा जाए। घाटी में लंबे समय से संघर्ष चल रहा था, सुप्रीम कोर्ट का सात-आठ साल के बाद फैसला आया था बांध के खिलाफ और फिर से बांध बनने लगा। जिस तरह वहां के लोगों की नैतिक और सैद्धांतिक लड़ाई को सरकार ने उठाकर बाहर फेंक दिया और खासकर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से, तो उसे जबर्दस्त नुकसान हुआ। तब मुझे लगा कि अपने काम के क्षेत्र का विस्तार किया जाना चाहिए। 2002 में पानी पे लिखा बनाने के बाद मैं कश्मीर गया और जश्न ए आजादी बनाई। उसका इसके साथ संबंध तो है, क्योंकि मुझे लगने लगा आखिर जिसे हम लोकतांत्रिक अधिकार कहते हैं वह क्या सिर्फ नई दिल्ली तक आसपास के दो तीन जिलों तक सीमित है या सचमुच देश में पूरे देश में लोकतंत्र है। मेरे लिए यह फिल्म इसी लोकतंत्र की तलाश के बारे में है। इस लोकतंत्र में जो एक क्रांतिकारी लहर शुरू से रही है और जो लोग अपने को क्रांतिकारी कहते हैं, उनका लोकतंत्र में विश्वास नहीं है। लेकिन यह भी हो सकता है कि वे लोकतंत्र को दूसरी नजर से देखते हों। इसलिए जब फिल्म बननी शुरू हुई थी तो मैंने कोई नक्शा बनाकर किसी भी फिल्म पर काम नहीं शुरू किया था, लेकिन मेरी चारों फिल्में, खासकर लंबी फिल्में पानी पे लिखा, जश्न-ए-आजादी और माटी के लाल, वे हैं तो लोकतंत्र के बारे में ही, पर वे आपस में जुड़ गई हैं।
अगर इन चारों फिल्मों के संदर्भ में हिंदुस्तान को आप कहां पाते हैं। क्या कहीं भी ‘इंडिया शाइनिंग’ या ‘इंक्रीडेबल इंडिया’ की कोई झलक मिलती है?
मैं कभी इन फिल्मों को मायूसी की नजर से नहीं देखता हूं, क्योंकि कभी-कभी ऐसा लगता है कि जब हम चीजों को बारीकी से देखते हैं तो महसूस होता है कि यह तो आलोचना है। लेकिन मैं समझता हूं कि लोकतंत्र की योजना (प्रोजेक्ट) 1947 में नहीं आयी और ऐसा भी नहीं है कि 1947 के बाद लोकतंत्र पूरी तरह आ गया। मेरी समझ से लोकतंत्र की योजना काफी लंबी है या कहिए कि यह ‘वर्क इन प्रोग्रेस’ (सतत चलता काम) है। मुझे लगता है कि हम सबकी यह जिम्मेदारी है कि हम हर दिन उस पर नजर रखें और किसी को हमला न करने दें। इसलिए मुझे लगता है कि जो भी संघर्ष चल रहे हैं, उन्हें ही मैं ‘इंक्रीडेबल इंडिया’ मानता हूं। जब आप फिल्म बना रहे होते हैं तो उन लोगों के साथ आपको रहने का अवसर भी मिलता है और जैसे वे जी रहे हैं और जो वे कर रहे हैं, उसे देखने का भी। मेरे हिसाब से ‘शाइनिंग इंडिया’ भी वही है।
सरकार की विनाशकारी नीतियों का विरोध करने और नक्सलियों के प्रति सहानुभूति भी रखने वाले कई लोगों का कहना है कि आपने छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को हथियार से लैस दिखाकर उनकी प्रशासन के सामने पहचान करवा दी, जो उनके लिए खतरा साबित हो सकता है। क्या इससे आपको बचना नहीं चाहिए था?

देखिए, सरकार और कॉरपोरेटाइज मीडिया इस बात से सहमत होंगे कि छत्तीसगढ़ के जो आदिवासी हैं और लडऩे वाले हैं उनके बारे में किसी को कुछ पता न चले, उनकी शक्लें न दिखें, वे जीते-जागते लोग हैं या फिर हैवान हैं उनकी तस्वीर नहीं दिखनी चाहिए वे बिना शक्ल के होने चाहिए, जो बीच-बीच में निकलकर किसी नेता को अगवा कर लेते हैं, पुलिस बल पर आक्रमण कर देते हैं। उनकी शक्ल न दिखाना और उनकी पहचान छुपाना माइथॉलॉजी को बढ़ावा देना है। क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि जिन्होंने बंदूकें उठा ली हैं, चाहे वे कश्मीर में हैं या फिर बस्तर में, आखिर वे लोग कौन हैं और वे चाहते क्या हैं? हो सकता है कि जिन्होंने बंदूकें उठा ली हैं उन्होंने बहुत सोच-समझकर यह निर्णय लिया हो। यह भी हो सकता है कि वे बहुत तार्किक लोग हों और उनकी राजनीति हमसे ज्यादा विकसित हो। जब तक हम उनसे अवगत नहीं होंगे, खासकर फिल्मों में, मुझे लगता है यह ठीक नहीं हैं। अगर हम बस्तर में पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी को फिल्म में 15-20 मिनट तक उनकी तस्वीर देखते हैं या फिर उन्हें भूमकाल में नाचते हुए देखते हैं, तो मैं समझता हूं कि यह फिल्म का बहुत जरूरी पहलू है। जो आदमी पीएलजीए या वर्दी पहन लेता है या जो महिलाएं अपने बाल कटवा लेती हैं या फिर जो युवक सौ रुपए की सस्ती-सी डिजीटल घड़ी पहन लेता है, जो उन्हें पार्टी की तरफ से मिलती है, तो समझ लीजिए कि उन्होंने सबसे पहले अपनी मौत चुन ली है। इसलिए जब मैं जंगल में गया तो हमसे उनके सीनियर कॉमरेड ने खुद कहा कि आप जिसे चाहें फिल्मा सकते हैं, जबकि हमने तब तक अपना कैमरा भी नहीं निकाला था। उन्होंने कहा कि आप फिल्म में किसको नहीं दिखाएंगे, यह मैं खुद बता दूंगा। वह सीनियर कॉमरेड यह इसलिए नहीं कह रहे थे कि वे कुछ सीनियर कॉमरेड को नहीं दिखाना चाहते थे या सिर्फ जूनियर कॉमरेड को ही दिखाना चाहते थे। उनका कहना था कि कुछ लोगों को इसलिए नहीं दिखाइए क्योंकि वे कभी-कभी सामान लाने बाहर जाते हैं और उनकी पहचान हो सकती है। इसलिए ये जो बहस है और आपका ये सवाल भी मेरे सामने कोई पहली बार नहीं आया है, बल्कि यह मध्यमवर्गीय चिंता है जो पहले भी कई जगह स्क्रीनिंग में आ चुकी है। हो सकता है कि मध्यमवर्गीय चिंता (मिडिल क्लास एंक्साइटी) के चलते बंदूकधारी व्यक्तियों की बात सुनने से, हिंसा-अहिंसा के बहस से उनकी बात कहने में थोड़ी सी डगमगाहट आ जाए। लेकिन मैं इससे बिल्कुल सहमत नहीं हूं। रही बात उन्हें न दिखाने की, तो जो चाहते हैं कि उनको न दिखाया जाए, उसे कौन फिल्मकार दिखा सकता है या दिखाएगा?
फिल्म माटी के लाल में एक सीन बार-बार आता है जिसमें पंजाब में कॉमरेडों का समूह नाटक करता है, जुलूस निकालता है, प्रदर्शन करता है, लेकिन गहरा संघर्ष कहीं दिखता नहीं है- भले ही वह पाश या भगत सिंह की शहादत मना रहे हों। जबकि जब हम छत्तीसगढ़ में भूमकाल का दृश्य देखते हैं, तो उसमें वास्तविक संघर्ष दिखता है। या फिर उड़ीसा के नियमगिरी की पहाडिय़ों में जो संघर्ष दिखता है वह पंजाब में नहीं दिखता है या कहिए कि ये सारी चीजें सचमुच नाटकीय लगती हैं। क्या आप भी मानते हैं कि वहां संघर्ष सिर्फ नाटकों या प्रदर्शनों तक ही रह गया है? जबकि हम अजय भारद्वाज की तीनों फिल्मों को देखते हैं तो सामाजिक स्तर पर काफी उथल-पुथल महसूस होती है, जो आपकी फिल्मों में नहीं दिखती। क्या मैं सही पढ़ रहा हूं आपकी फिल्मों को?
इसकी दो वजहें हैं। फिल्म की संरचना बस्तर और नियमगिरी में है। पंजाब को इसमें लाने की कोशिश इसलिए थी कि हम उस संघर्ष को एक रूप में देखें और दर्शकों को वहां से थोड़ा बाहर निकाला जाए। हमें लगता था कि यह पंजाब से हो सकता है। आप मानेंगे कि पंजाब में गांव तो गांव नहीं रहा है, हरित क्रांति और पूंजीवादी कृषि के चलते पूंजी का प्रवाह जैसा शहर में हुआ है वैसा ही गांव में भी है और पूरे भारत में उस मॉडल का सबसे बेहतरीन उदाहरण पंजाब है। वैसे यह अलग बात है और जो फिल्म में नहीं है कि पंजाब में किसानों का आंदोलन धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है। आपको पंजाब के बारे में अलग तरह से सोचना पड़ेगा, क्योंकि जो स्थिति नियमगिरी में है या देश के अन्य भागों में है, वह स्थिति किसानों की पंजाब में नहीं है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि वहां किसानों का आंदोलन नहीं है। अगर वहां किसी किसान की जमीन की नीलामी काकोई बैंक या सरकार नोटिस लगाती है, तो नीलामी के दिन दो-तीन हजार किसान अपने आप जमा हो जाते हैं और सरकारी अधिकारियों को वापस जाना पड़ता है। इसलिए अगर भगत सिंह या किसी के नाम पर दो-तीन हजार लोग जमा हो जाते हैं, तो इसका मतलब है कि यह किसी न किसी रूप में विचारधारात्मक प्रतिबद्धता (आइडियो-लॉजिकल कमिटमेंट) है, क्योंकि वे लोग भाड़े पर नहीं लाए गए हैं। इसलिए मैं उनके संघर्षों को कभी सांकेतिक नहीं मानता।
लोगों का कहना है कि माटी के लाल फिल्म माओवादियों पर है, जबकि नियमगिरी में पूरे आंदोलन का नेतृत्व लिंगराज कर रहे हैं जो गांधीवादी समाजवादी हैं, आपका इसके बारे में क्या कहना है?
जहां कहीं भी मैं यह फिल्म दिखाने जाता हूं तो उसको लोग इसी नजरिए से देखते हैं कि यह फिल्म माओवाद के बारे में है, तो उसमें नियमगिरी क्यों है या पंजाब क्यों है? इससे मुझे भी बहुत दिक्कत होती है, जबकि हमारी मंशा यह थी ही नहीं कि हम सिर्फ माओवाद पर फिल्म बना रहे हैं। फिल्म की कोशिश यही थी कि हमारे लिए जिस तरह की लड़ाई लिंगराज आजाद और नियमगिरी सुरक्षा समिति वाले उड़ीसा में लड़ रहे हैं, उतनी ही अहमियत उनकी भी है जो बस्तर में लड़ रहे हैं। जिस तरह का मोबलाइजेशन पंजाब में संस्कृति के इर्द-गिर्द किया जा रहा है, माओवादियों ने वही सांस्कृतिक मोबलाइजेशन बस्तर में किया है। फिल्म का एक उद्देश्य यह था कि हम सिर्फ एक तरह के संघर्ष को पहचान न मानें। हम इतने जटिल समय में हैं कि पंजाब का पांच या दस एकड़ जमीन वाला संपन्न किसान भी अपने को लडऩेवाला मानता है और नियमगिरी के आदिवासी भी अलग तरह से संघर्ष कर रहे हैं। दोनों के संघर्ष एक से नहीं हो सकते हैं, लेकिन इस ‘बायोडावर्सिटी ऑफ रेजिस्टेंस’ में भी एक क्रांतिकारी संभावना का तार है। लोग चाहते हैं, जो स्थिति है इसको धीरे-धीरे सुधारें नहीं बल्कि बदलाब लाने की कोशिश करें, क्योंकि असली क्रांति तो बदलाव ही है और इसी के लिए कोशिश करनी है।
फिल्म पानी पे लिखा और माटी के लाल में नियमगिरी में जो संघर्ष है, वह पूरी तरह अहिंसक है। लोगबाग सचमुच अहिंसक हैं और फिल्म को देखें तो पुलिस के अलावा किसी के पास कोई हथियार नहीं हैं, लेकिन सरकार और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल कोई भी नुमाइंदा उनकी एक भी बात मानने को तैयार नहीं है, तो क्या आपको लगता है कि उनके पास हिंसा के अलावा और कोई रास्ता बच जाता है?
आपके पहले सवाल के जवाब में मैंने कहा था कि यह फिल्म लोकतंत्र के बारे में है। लोगों को याद होगा कि कश्मीर में पहली बार लोगों ने 1989-90 में हथियार उठाए थे। लोगों ने बीसियों साल से लोकतांत्रिक ढंग से अपनी बात कहनी चाही थी, लेकिन उनकी कोई बात नहीं सुनी गई और फिर स्थिति ऐसी बनी कि जब लोगों ने हथियार उठा लिए तो अब आपको पता है कि हालात क्या हैं। नर्मदा घाटी की लड़ाई हो या नियमगिरी की, कोर्ट के जरिए या डंडे के जरिए अगर आप लोगों की बातों की अवहेलना करेंगे या फिर उड़ीसा में ही पॉस्को के खिलाफ या टाटा के खिलाफ कलिंगनगर में चल रहे संघर्ष हैं, तो हम जानते हैं कि लोग वहां जी-जान से उसका जबर्दस्त विरोध कर रहे हैं। हर तरह से उन्हें बाहर करना चाह रहे हैं, लेकिन जब आप उनकी बात नहीं सुनेंगे, उन्हें रौंद देंगे और डंडे की बदौलत लोगों का विनाश करेंगे तो फिर 10-15 सालों के बाद अगर वही लोग या फिर उनमें से कुछ लोग हथियार उठा लेते हैं और हिंसक संघर्ष के लिए तैयार हो जाते हैं तो यह हम सबकी जिम्मेदारी बन जाती है। लेकिन कॉरपोरेट मीडिया और सरकार उसे इस रूप में पेश करते हैं कि यह लड़ाई हिंसा और अहिंसा के बारे में है, जबकि बात लोकतंत्र को बचाने और लोकतंत्र को खत्म करने की होनी चाहिए।
कुछ लोगों का आरोप है कि आप जैसे लोगों को भारतीय लोकतंत्र में सिर्फ बुराई ही नजर आती है, जबकि इस साल को छोड़ दीजिए तो जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) इतना अच्छा रहा है, भारत इतना विकास कर रहा है, लेकिन आपको कुछ भी अच्छा नहीं दिखता है?
अगर जीडीपी ही पैमाना है, तो भारत सचमुच विकास कर रहा है। चीन को देखें। वहां बहुत विकास हो रहा है और विकास के इस दौर में नदियां, पहाड़, जंगल और प्रजा… सबको बर्बाद कर दिया गया है और आने वाले सौ वर्षों तक पूरा देश इसके दुष्परिणाम भोगता रहेगा। इस 10-20 साल में जिसे हम विकास काल मानते हैं, सोचना चाहिए कि उसका इतना विरोध क्यों हो रहा है। पंजाब में हरित क्रांति के बाद क्यों लोग सड़क पर आ रहे हैं। दूसरी ओर दिल्ली में एसी बसें हैं, मेट्रो है और पॉश कॉलोनियां में जन सुविधाएं भी हैं, लेकिन अगर दिल्ली में ही हाशिए के लोगों को देखें तो पता चलेगा कि हालात क्या हैं। अगर जीडीपी की बात करें तो कापसहेड़ा और मानेसर के लोगों को भी देखा जाना चाहिए, जिनका जीडीपी बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योगदान है। लेकिन दो-दो शिफ्ट में काम करने के बाद भी उनके हाथ छह-सात हजार रुपए से अधिक नहीं आता है। आखिर स्थिति इतनी भयावह क्यों है? हर हाथ में मोबाइल को सोशल इंडिकेटर (सामाजिक समृद्धि का संकेतक)का पैमाना नहीं मान सकते। इसका असली पैमाना यह होगा कि बच्चों में मृत्यु दर कितनी कम हुई है, पहले से कितने कम लोग भूखे पेट सोते हैं, और ये सब देखें तो आपको पता चलेगा कि हालात बहुत ही खराब हैं।
जब एनडीए की सरकार थी तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात काफी जोर-शोर से उठाई गई थी और आप लोगों ने फिल्म्स फॉर फ्रीडम के नाम से एक बहुत ही सार्थक कार्यक्रम भी चलाया था, लेकिन जब यूपीए की सरकार आई तो यह कार्यक्रम लगभग या पूरी तरह थम सा गया। क्या आप या आपलोग सचमुच यह मानते हैं कि समस्या सिर्फ एनडीए के समय ही थी और यूपीए के आने के बाद सबकुछ ठीक हो गया या फिर आपलोग ही शिथिल पड़ गए। वास्तव में वक्त बदला है या चीजें यथावत हैं?
आपका सवाल काफी बढिय़ा है। देखिए, भाजपा और कांग्रेस के बीच अंतर तो बहुत हैं। अगर भाजपा के शासनकाल में उनकी बात नहीं मानी जाती थी, तो अपने गुंडों को भेजकर तोडफ़ोड़ करवा देते थे, मारपीट पर उतर आते थे, लेकिन कांग्रेस बहुत ही चालाक पार्टी है, उसके पास शासन करने का लंबा इतिहास है। यूपीए और कांग्रेस की नीति बाजार से संचालित है, इसलिए ये सेंसरबोर्ड, गुंडागर्दी या सीधे बदमाशी के जरिए काम नहीं करती, बल्कि बाजार के जरिए भी उनका बहुत काम हो जाता है। आप देखेंगे कि मास मीडिया या टेलीविजन पर सेंसरशिप नहीं है, लेकिन क्या कारण है कि उन मुद्दों पर वहां पूरी तरह चुप्पी है जिनपर सरकार चाहती है? इसलिए बाजार के जरिए भी बहुत से काम हो जाते हैं और सीधे सेंसर की जरूरत भी नहीं पड़ती। रही बात फिल्ममेकर्स के कंपैन की, तो कंपैन तो कंपैन की तरह ही होना चाहिए। इसे पेशा नहीं बनाना चाहिए। लेकिन इस कंपैन का काफी असर हुआ है। देश के विभिन्न हिस्सों में प्रतिरोध के सिनेमा के बैनर तले छोटे-छोटे फिल्म फेस्टिवल होने लगे हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश के कई शहरों में लगातार फिल्में दिखाई जा रही हैं और जब हम इसकी तुलना करें तो दुनिया के किसी कोने में इस तरह फिल्में अभी नहीं दिखाई जा रही हैं, यह बड़ी उपलब्घि है।
आपको फिल्म बनाते हुए तीस साल से अधिक हो गए, क्या कुछ बदला है?
अस्सी के दशक में जब मैं यूनिवर्सिटी से निकला तब से बहुत कुछ बदला है फिल्ममेकिंग के क्षेत्र में…
मैं टेक्नोलॉजी की बात नहीं कर रहा हूं…?
देखिए, जो बदला है वो टेक्नोलॉजी से अछूता नहीं है। क्योंकि उस वक्त जो फिल्में बनती थीं, तो वही लोग होते थे देखने वालों में जो फिल्म बनाते थे। साल में दस-बीस फिल्में बनती थीं और सब एक-दूसरे को जानते थे। अब कोई फिल्म बनती है, तो अगर तीन सौ लोगों की क्षमता वाला ऑडिटोरियम है तो वह पूरी तरह भर जाता है। डिस्ट्रीब्यूशन काफी आसान हो गया है। खरीददार बढ़ गए हैं, तो कुल मिलाकर मेरा मानना है कि काफी कुछ बदला है और ज्यादातर चीजें तकनीक के आसान होने से हुई हैं। छोटे प्रोजेक्टर लेकर किसी भी जगह को आप स्क्रीनिंग स्पेस में तब्दील कर सकते हैं।
वैसे यह सवाल काफी मूर्खता भरा है, फिर भी मैं पूछ रहा हूं कि क्या डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाकर जिंदगी जी जा सकती है?
नहीं, बिल्कुल नहीं। जब कोई व्यक्ति यह पूछने आता है कि इसमें मैं कैरियर बनाना चाहता हूं, तो मेरा स्पष्ट जवाब होता है कि नहीं, इसमें कैरियर तो कतई नहीं है। अच्छी डॉक्यूमेंट्री जुनून से बनती है और कैसे बनती है, इसे सब लोग जानते भी नहीं हैं। जब हम अपने सहयोगियों की फिल्म देखने जाते हैं और फिल्म खत्म होने के बाद क्रेडिट लाइन देखते हैं, तब पता चलता है कि उनको सपोर्ट कहां से मिला है। फिर भी अच्छी फिल्में बन रही हैं और वे लोग बना रहे हैं जिनके पास मीडियम की समझदारी है, लेकिन वे बहुत संपन्न नहीं हैं, पर काम महत्त्वपूर्ण कर रहे हैं। डॉक्यूमेंट्री फिल्म कैरियर तो नहीं है और शायद इसी ने इसे बचाकर रखा है।
क्या डॉक्यूमेंट्री फिल्म एक कल्चरल प्रोडक्ट के रूप में अब भारत में अपने आप जीवित रह सकता है। जबकि हिंदी फिल्मों का इतना बड़ा बाजार है और खरीददार भी हैं, डॉक्यूमेंट्री फिल्म का कोई बाजार बन पाया है?
बिल्कुल, पहले एक छोटा तबका था जो इस तरह की फिल्में देखता था। मैं अक्सर कहता हूं कि इसे देखना और दिखाना संगीत की तरह है। बहुत लोगों ने इस पर मेहनत की है और उनकी मेहनत का ही यह परिणाम है कि अब पैसा भी आने लगा है। पहले जब हम फिल्म दिखाते थे, तो फिल्म के अंत में दो लोग आते थे कि क्या इस फिल्म की वीएचएस कॉपी मिल जाएगी, लेकिन जब आज आप किसी फिल्म की स्क्रीनिंग करें तो गारंटी मानिए कि अगर बाहर आपके डीवीडी पड़े हों तो सौ कापी तो जरूर बिक जाएंगी। इसलिए अब जब दर्शक देखने आते हैं, तो वे अपने पॉकेट में पैसे लेकर आते हैं और देखने के बाद खरीदते भी हैं, जो पहले बिल्कुल नहीं था।
साभार: समयांतर 

शुक्रवार, 27 जून 2014

सिनेमा: अभिव्यक्ति का नहीं अन्वेषण का माध्यम: कमल स्वरुप

भारतीय सिनेमा के सौ होने के उपलक्ष्य में अपने तरह का एकदम अलहदा फिल्म-निर्देशक कमल स्वरुप से ’हंस- फरवरी- 2013- हिन्दी सिनेमा के सौ साल’ के लिए  उदय शंकर द्वारा लिया गया एक साक्षात्कार

कमल स्वरुप


(८०-९० के दशक में सिनेमा की मुख्या धारा और सामानांतर सिनेमा से अलग भी एक धारा का एक अपना रसूख था. यह अलग बात है कि तब इसका बोलबाला अकादमिक दायरों में ज्यादा था. मणि कौल, कुमार साहनी के साथ-साथ कमल स्वरुप इस धारा के प्रतिनिधि फ़िल्मकार थे. वैकल्पिक और सामाजिकसंचार साधनों और डिजिटल के इस जमाने में ये निर्देशक फिर से प्रासंगिक हो उठे हैं। संघर्षशील युवाओं के बीच गजब की लोकप्रियता हासिल करने वाले इन फिल्मकारों की फिल्में (दुविधा,माया दर्पण और ओम दर बदर जैसी) इधर फिर से जी उठी हैं। आज व्यावसायीक और तथाकथिक सामानांतर फिल्मों का भेद जब अपनी समाप्ति के कगार पर पहुँच चूका है, तब इन निर्देशकों की विगत महत्ता और योगदान पुनर्समीक्षा की मांग करता है।

कमल स्वरुप फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट पुणे के1974 के स्नातक हैं। घासीराम कोतवाल(1976),अरविन्द देसाई की अजीब दास्तान (1978), गाँधी(1982), सलीम लंगड़े पर मत रो (1989), सिद्धेश्वरी(1989)जैसी फिल्मों में सहायक निर्देशक, संवाद लेखक, प्रोडक्शन डिजाइनर और शोधार्थी के बतौर इनका रचनात्मक सहयोग रहा है। बतौर निर्देशक-निर्माता कमल स्वरुप ने अभी तक सिर्फ एक फिल्म बनाई है- ओम दर बदर(1988), भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी तरह की एक मात्र कल्ट फिल्म, फिल्म फेयर पुरस्कार से पुरस्कृत। ओम दर बदर के अलावे कुछ डाक्यूमेंटरी फिल्में भी। दादा साहेब फाल्के और भारतीय फिल्म-इतिहास का अद्भुत अध्य्येता। फ़िलहाल दादा साहब फाल्के का महा-वृतांत रचने में मशगुल।

Tracing Phalke By kamal swaroop


प्रश्न एक: भारतीय सिनेमा की एक सदी बीत गई। तो, सबसे पहला सवाल यही कि सिनेमा क्या है? और इस आलोक में भारतीय-सिनेमा की विशेषताएं क्या हैं?

कमल स्वरुप- हमारा अधिकांश सिनेमा या तो वास्तविक जीवनकाल का एक संक्षिप्त संस्करण होने का प्रयत्न है या फिर किसी साहित्यिक कृति की जस की तस अनुकृति होने की कोशिश। मैं चाहता हूँ कि ऐसे फिल्मकार हो जो अपनी कृति को सदा सफल और लोकप्रिय मुहावरों में तिरोहित कर देने की जगह सिनेमा को साहित्य के नाट्यकृत पुनरुत्पादन की भूमिका से खुद को अलग कर पाठ,गति, ध्वनि और बिम्ब के सम्बन्ध को पुन्व्यर्ख्यायित करने का प्रयत्न करें। सिनेमा अभियक्ति का नहीं अन्वेषण का माध्यम है। सिनेमा के वस्तुगत यथार्थ का लेखक के अंतर्जगत, नैतिकता या सौंदर्यशास्त्र से कोई सम्बन्ध नहीं है। ये तत्व यथार्थ को दोष-पूर्ण बनाते हैं। सिनेमा- भावुकता और प्रतीकात्मता से रहित। शुद्ध कला कृति। ऐसा आलें रॉब ग्रिए का कहना है और मैं उनसे पूर्णतया सहमत हूँ।

संख्या की दृष्टि से देखा जाए तो भारत दुसरे देशों की तुलना में बहुत आगे है। यूरोप का फिल्म-उद्योग हॉलीवुड के हमले के सामने घुटने टेक चुका है। केवल भारत है जिसका फिल्म-उद्योग आत्मनिर्भर है। किन्तु, सिनेमा की दृष्टि से देखा जाए तो भारतीय फिल्में अभी तक नौटंकी और नाट्य-संगीत से ऊपर नहीं उठी हैं। शायद यही कारण है कि वह अब तक हॉलीवुड से बचा हुआ है।
प्रश्न दोः भारतीय सिनेमा ‘राजा हरिश्चंद्र‘ से शुरू होकर ‘ओमदरबदर‘ से होते हुए वर्तमान तक आकर आता है. और इस यात्रा-क्रम में भारतीय-सिनेमा मिथक, विज्ञान, और संस्कृति का सम्मिलन लगता है. इन श्रेणियों(synthesis) की अभिव्यक्ति के रूप में सिनेमा को कैसे देखते हैं!! (The movie omdarbadar comingles mythology, science, tradition and creats the existentiality of the present. How do you see film as the expression of the synthesis of these categories !

कमल स्वरुप- आज जो भी मूल्य हैं सब अतीत के हैं। प्रारंभ में फिल्मों का उपयोग दुसरे माध्यमों में प्रकट कलाकृतियों को किसी स्थायी माध्यम में परावर्तित करने का प्रयास था। कथा-कहानियां, नाटक, या फिर रविवर्मा के पौराणिक चित्र। इन कृतियों के प्रतीकों में समकालीनता को तलाशते हुए उनके राजनैतिक रूपांतरण की कोशिश हुयी। फिर आये ऐतिहासिक आख्यान और संतों के जीवन- चित्र। फिल्में अतीत की स्मृतियों के व्यापक प्रचार-प्रसार का माध्यम बना। फिल्मों में ध्वनि के आगमन के बाद अतीत की उन्हीं मूक कहानियों को फिर से दोहराया गया, चित्रित किया गया। और, फिर आये सामाजिक समकालीन नाटकों और साहित्यिक कृतियों का फ़िल्मी रूपांतरण।

सिनेमेटोग्रफिक यंत्रों का अविष्कार और विकास-क्रम अपने आप में एक स्वयंसिद्ध घटना थी।वह कला का माध्यम कब बनी और कैसे बनी ,वह दूसरी बात है लेकिन हमें ये बात भी नहीं भूलना चाहिये कि सिनेमेटोग्राफी जादूगरों, जांत्रिकों और तांत्रिकों के मिले जुले प्रयत्न थे, उनकी इच्छा शक्ति थी। कुछ लोगो का मानना है कि केवल एक प्राकृतिक संयोग भर था। अनेक नए उपन्यासकारों में सिनेमा के प्रति उत्पन हुये आकर्षण का कारण क्या था? वे कैमरे की वस्तुपरकता से नहीं बल्कि उसकी आत्मपरकता और कल्पनात्मक संभावनाओं से प्रभावित हुये थे। वे सिनेमा को अभिव्यक्ति का नहीं, बल्कि अन्वेषण का माध्यम मानते थे। और, उन्हें सर्वाधिक दिलचस्पी उस पदार्थ में हुई जिसे लेखन में व्यक्त करना ज़रा भी संभव नहीं था। दोनों इंद्रियों, आँख और कान, पर एक साथ खेल करना। इन बोलते चलचित्रों में कोई एक आदिम गुण है। और वह वर्तमान का हिस्सा है। सनातन वर्तमान का समूचा बल और वेग। सिनेमा, बिम्बों की प्रकृति का नहीं बल्कि उनकी संरचना का सवाल था। ये नयी फ़िल्मी सरंचनाएँ, बिम्बों और ध्वनियों की ये हलचलें दर्शक की समझ में फ़ौरन आ जाती हैं। इनकी ताकत साहित्य से बहुत बड़ी है। यही युग न्यू थियेटर, बाम्बे टाकीज और प्रभात का था।फिर बने तारे सितारे। उनके प्रजनन के अनुष्ठान, मानों सिनेमेटोग्रफिक मशीन की मूल प्रकृति, मेकेनिकल्स मीन्स ऑफ़ रिप्रोडक्शन,को मुंह चिढ़ाते। ये नए फोटोजेनेटिक्स (photo-genetics) पीढियों दर पीढ़ियों का राष्ट्रीय कैलेंडर रचने लगा। कथा केवल उनके प्रेमपुराण थे। हम उनके जन्म-मृत्यु से अपना जीवन नापने लगे। साहित्य-सिनेमा ने इस प्रजनन की निष्ठुरता और असहिष्णुता के सामने घुटने टेक दिए। पूँजी के हाथ एक कालजयी हरम लगा था। इस मादक अग्निस्नान में दर्शक स्वाहा होने लगा। काल की बलि चढ़ा।

मैं अब सीधे ओम दर बदर पर आना चाहूँगा। कुछ घुमा-फिरा कर। किसी महान रचनाकार के शब्द हैं जिनका नाम मैं नहीं बताना चाहता हूँ। नक़ल से अकल वो रहे सदा। वो फिल्म मेरी कल्पना के टुकड़े थे और मैं भाषा के समान सरचना का आनंद ले रहा था। किन्तु मैं चाहता था कि एक ऐसे संसार का संवाहक बनूँ जो कि न तो बिम्ब है, न ध्वनि। यही वह संसार है जिस तक मैं विभिन दिशाओं से, अनेक सड़कों से होकर पहुँचाना चाहूँगा और वो सत्य मेरे बचपन का दानव होगा। वह उसी दानव से बचने के लिए बुनी गयी कहानी थी। मृत्यु से बचने का मेरा उपहास-जनक अनुष्ठानिक-प्रयत्न और उसका भयावह अंकन। ओम फिल्म नहीं है, वह फिल्मों से पलायन का चित्रण है। मैं सिनेमा के संसार में भाग कर आया था, यथार्थ से छुपने किन्तु मैंने पाया कि सिनेमा मृत्यु भी है और पुनर्जीवन भी और ओम के द्वारा मैं भाग निकला, यह मैं दावे के साथ कहता हूँ। मुझे अपनी मॉक (mock)- मृत्यु का खेल खेलने में खूब मज़ा आया। ओम फिल्म नहीं, खुद को एक झांसा था और न ही मैं कोई फिल्मकार।

Om darbadar(1988)


प्रश्न तीनः सिनेमा अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में क्या हमारे सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन को दिशानिर्धारित करने में सक्षम है? स्वातंत्र्योत्तर भारतीय सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में हस्तक्षेप करने में यह कितना सक्षम हुआ है!! पूरी भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में (एक-दो अपवादों को छोड़) कोई भी अच्छी राजनैतिक फिल्म नहीं बन पाई है। इसमें सेंसर बोर्ड की ज़िम्मेदारी है या साहस की कमी?

कमल स्वरुप- मेरे लिए सिनेमा अभिव्यक्ति नहीं कितु अभिव्यक्ति के विभिन्न व्याकरणों की जांच-पड़ताल है। जैसा की शुरू में कहा कि अन्वेषण है। वैसे भी रियल नारियल है, क्यों और सरपलस (surplus) पैदा किया जाये। हमें ‘भंगी’ फिल्मकारों की ज़रुरत है जो झाड़ू फेरे और इस रियल नारियल के खिलाफ जंग छेड़े। वर्ना पता नहीं लगता नेहरू जी की मुद्रा दिलीप कुमार से आई थी या दिलीप कुमार की नेहरू जी से। नर्गिस मदर इण्डिया पहले बनी या फिर शक्ल समान होने का कोई खानदानी राज़ है।

मज़े की बात है कि फालके खुद स्वदेशी आन्दोलन के हिस्सा थे और तिलक के जीवन से प्रभावित थे। जब उन्होंने लाइफ ऑफ़ क्राइस्ट देखी तो लगा हम अपने भारतीय बिम्ब कब परदे पर देखेंगे। ये विदेशी कल्पनाएँ हमारी चेतना को धीरे धीरे नष्ट कर देंगी। शुरू की फिल्मों के बिम्बों में गूढ़ राजनैतिक संदेश छुपे हुये रहते थे और अंग्रेजों को सेंसर बोर्ड की स्थापना करनी पड़ी थी। पौराणिक आख्यानों के बाद ऐतिहासिक फिल्मों के ज़रिये एक राष्ट्रवादी उतेजना को पैदा किया जाने लगा था। उसके बाद सामाजिक फिल्मों के ज़रिये समाज में व्याप्त रुढ़िवादी रीति-रिवाजो पर प्रहार किये जाने लगे।भक्ति काल के संतो पर बनी सभी फिल्में खूब सफल रहीं । फिल्मों के ज़रिये से एक आत्मविश्वास जगाया जा रहा था।

अब रही बात आज की। सबसे पहले मैंने राजनैतिक फिल्मों की बात कुमार शाहनी से सुनी थी उन दिनों मैं उनकी फिल्म तरंग में काम कर रहा था। वे वामपंथी विचारधारा से जुड़े थे। मैंने समझा कि राजनैतिक फिल्में, सत्ता के शक्ति-संघर्षो की कथा होती है। उसे दर्शाने के लिए वे वामपंथी विचारों का या कहें तो फार्मूला का उपयोग करते थे। फिर जाना कि सत्ता-संघर्ष केवल देश में ही नहीं, यहाँ तक कि परिवार में भी चलती है और वह किसी भी आधार पर हो सकती है।

अब मैं मनाता हूँ की एक ही बात को विभिन कोणों से देखने पर अलग घटना का निर्माण होता है।और वे सारेदृष्टिकोणअलग-अलग विचारधारा का निर्माण करती हैं जो कि हमारे निजी स्वार्थों से नियंत्रित होती हैं। निजी स्वार्थों से परे जाने के लिए हमे एक वस्तुनिष्ठ विज्ञान का सहारा लेना पड़ता है जो कि एक असम्भव कार्य है। यहाँ पर समानुभूति की अपेक्षा की जा सकती है, जिस की कमी आज हम सब में है। मैंने यह बात केवल घटक में देखी है।

प्रश्न चारः समकालीन बॉलीवुड सिनेमा में तकनीकी विकास तो झलकता है किन्तु विषय वस्तु के स्तर पर अधकचरापन बार-बार उभरकर आता है। बड़े निर्देशकों की फिल्मों में भी! इसे बौद्धिकता के अभाव से जोड़कर देखा जाए या ईमानदारी के अभाव से? एक कला-माध्यम के रूप सिनेमा की स्वायत्तता को आप कैसे देखते हैं?

कमल स्वरुप- डिजिटल के आने से मुझे लगता है कि हम पहली बार स्वायत्तता को क्लेम कर सकतें हैं। सिनेमा अनुभूति और संवेदना, व्यष्टि और समष्टि के सम्बन्ध का विज्ञान है। विभिन्न नाट्य एवं ललित कलाओ का समिश्रण है। किसी घटना के काल और दिक् के आयामों का रूपांकन है। इस स्तर की सूक्ष्मता का बॉलीवुड में पूर्णतया अभाव है। हमारे यहाँ अब तक प्रोडक्शन डिजाइन (production design) नाम की चीज़ का पता नहीं है। फिल्म का मतलब है स्टार कौन है और इसी बात पर पैसा उठता है। बॉलीवुड की अपनी भाषा है और उसका जीवन से कोई सम्बन्ध या जीवन के प्रति कोई प्रतिबद्धता नहीं है। और उन्हें देखना हमारी आदत बन चुकी है, हमारे काल का निर्णय उसी से होता है। जब आमिर खान चलता है तो सब लड़के उसी जैसे लगने लगते हैं। जब अमिताभ चला था तो सब उसी जैसे लगने लगे थे .

प्रश्न पांचः बालीवुड सिनेमा की भाषा पहले उर्दू हुआ करती थी फिर हिन्दी-उर्दू का मिला-जुला खूबसूरत रूप। अस्सी के दशक के बाद हिन्दी में बोले गए संवादों को दुबारा अंग्रेजी में दोहराने का चलन बढ़ा जिससे फिल्मों की लंबाई भी अनावश्यक रूप से बढ़ती थी और अब ज्यादातर सिनेमा के नामों में भी अंग्रेजी के नाम जोड़े जाने लगे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है?

कमल स्वरुप- बोलती फिल्मों के शुरू होने पर अधिकतर लेखक हिंदी उर्दू से आये थे, अधिकतर लाहौर से। अब तो हिंदी-उर्दू कोई भी नहीं पढ़ता। कुछ लोग एन एस डीसे भले आते हैं, पर अब मुंबई में हिंदी-उर्दू नाम मात्र के लिए बची है। धीरे धीरे बोलचाल की भाषा अंग्रेज़ी में बदल रही है। स्क्रिप्ट इंग्लिश में लिखी जा रहीं हैं। सवांद हिंदी में ज़रूर होते हैं पर अधिकतर अंग्रेजी फिल्मो के अनुवाद। हॉलीवुड इस बात को समझ रहा है और अपनी अधिकांश फिल्मों को भारतीय भाषाओं में डब करके एक नया बाज़ार खड़ा कर रहा है।
प्रश्न छः क्या हिन्दी सिनेमा की दुनिया भी दो हिस्सों में बंट गई है- एक इलीटिस्ट सिनेमा जो मल्टीप्लेक्स में चलता है–दूसरा जो मझोले शहरों और कस्बों में?

कमल स्वरुप- मल्टीप्लेक्स वाले दर्शक भारतीय फिल्मो में हॉलीवुड या योरोपियन फिल्मो का व्याकरण ढूंढने जाते हैं ,छोटे शहरों के लोग शायद अभी तक उससे परिचित नहीं हैं। पर एक ज़माना था जब यह अंतर नहीं था। हमारा अपना खुद का विकसित व्याकरण था। प्रभात, न्यू थिएटर, राजकमल आदि काफी आगे थे और किसी भी वर्ग के दर्शक से संवाद करने में सक्षम थे.
प्रश्न सात: भारतीय सिनेमा के सर्वांगीण के विकास के लिए क्या कुछ होना चाहिए?

कमल स्वरुप- उत्पादन का विकेंद्रीकरण। तत्पश्चात, प्रांतीय कृतियों का अनुवादों के जरिये आदान-प्रदान। नाट्य एवं ललित कलाओं के कर्मियों का एक-जुट मंच, हर शहर-प्रान्त में।साहित्यिक-पत्रिकाओं की तरह सिने-कृतियों का वितरण। हर छोटे शहरमें फिल्मोत्सव और सिने-शिक्षा के शिविर।
प्रश्न आठ: ओमदरबदर की परंपरा से प्रभावित युवा निर्देशक सिनेमा के व्याकरण को बदलने की कोशिश कर रहे हैं. क्या इसे सार्थक बदलाव के रूप में देखा जा सकता है?

कमल स्वरुप- कुछ दिन पहले मैंने आनंद गाँधी की Ship of Theseus देखी और उसे अपने काफी करीब पाया। पूर्णतः एक वैचारिक फिल्म, जो की ब्रहम-विभ्रम की प्रस्तुति के पार जाती है।
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