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रविवार, 27 जुलाई 2014

गुरुदत्त: ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्‍या है...


गुरुदत्त: वास्तविक नाम: वसन्त कुमार शिवशंकर पादुकोणे 
गुरुदत्त: अतृप्त कलाकार 
(हिन्दी फिल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता एवं निर्देशक) 

जन्म: 9 जुलाई, 1925 बंगलौर, निधन: 10 अक्तूबर, 1964 मुंबई 

1957 में बनी फ़िल्म प्यासा का यह अकेला गीत जो गुरुदत्त के ऊपर ही फिल्माया गया था उन्हें हमेशा-हमेशा के लिये अमर कर गया:


ये दुनिया जहाँ आदमी कुछ नहीं है, वफा कुछ नहीं,दोस्ती कुछ नहीं है;
जहाँ प्यार की कद्र ही कुछ नहीं है, ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है? 

जला दो इसे फूँक डालो ये दुनिया, मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया;
तुम्हारी है तुम ही सँभालो ये दुनिया, ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है? 

‘गुरुदत्त ने अपने 39 वर्ष के अल्प जीवन में छह फिल्मों की कहानियां लिखीं, तेरह में अभिनय किया, आठ फिल्मों का निर्देशन किया और सात फिल्मों के निर्माता रहे.’


ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्‍या है... 


‘‘अक्‍टूबर का महीना और मुंबई का सुहाना मौसम जिसमें देव आनंद और गीता दत्‍त के साथ गुरुदत्‍त ने; न जाने कितनी रातें मरीन ड्राइव और वर्ली के समुद्र तट पर भटकते हुए गुजारी थीं लेकिन ये रात उन रातों से थोड़ी अलग थी. उस रात पैडर रोड स्थित किराए के एक फ्लैट में गुरुदत्‍त बिलकुल अकेले थे. जिंदगी से आजिज आ चुका एक अकेला, अवसादग्रस्‍त, अतृप्‍त कलाकार. उनके बेहद करीबी भी नहीं जानते थे कि ये रात गुरुदत्‍त के जीवन की आखिरी रात होगी. आधी रात के करीब उन्‍होंने शराब के नशे में ढेर सारी नींद की गोलियाँ निगल लीं. रात बीती, सुबह हुई लेकिन सदी के एक महान कलाकार की आत्‍मा का सूरज अस्‍त हो चुका था.’’

भारतीय सिनेमा में गुरुदत्त को याद करने से पहले हमें गुरुदत्त को जानना होगा. 
गुरुदत्त को जानना एक अदम्य, अतृप्त प्यास से पूरा भर जाना है; अवचेतन मन बहुत आश्चर्यजनक है. वह कभी आपको खारे सागर की तलहटी में पेवस्त कर देता है तो कभी ज़ेहन को घुप्प अँधेरा समेटे घने जंगल में भटकने को छोड़ देता है. मन नास्टाल्जिया की परतों में गहरा गोता लगा कर कौन सी तस्वीर सामने खींच ले आएगा हम नहीं जानते. क्योंकि कला व्यक्तिपरक होती है, कुछ एकदम साधारण सी लगती है और समझ नहीं आता है कि दुनिया क्यूँ पागल है इसके पीछे. कला हो, फिल्म हों या किताबे, हमें वही पसंद आती है जिसमें कहीं न कहीं कुछ ऐसा मिल जाता है जो हमारे जीवन से जुड़ा होता है. कहीं न कहीं एक कांच का टूटा हुआ टुकड़ा; टूटा ही सही जिसमें हम अपना अक्स देख लेते हैं. गुरुदत्त को जानते हुए कुछ ऐसे ही अहसास दिल से दोचार होते हैं.

9 जुलाई, 1925 को मैसूर में एक मामूली हेडमास्‍टर और एक साधारण गृहिणी की संतान के रूप में वसंत शिवशंकर पादुकोण का जन्‍म हुआ था. माँ की उम्र तब मुश्किल से 13 साल की रही होगी. शुरू से ही आर्थिक परेशानियाँ और भावनात्‍मक एकाकीपन उसके हमराही रहे. माता-पिता के तनावपूर्ण संबंध, घरेलू दिक्‍कतें और सात वर्षीय छोटे भाई की असमय मौत ने उनके मानस पटल को जर्जर और उदास कर दिया था. पहले-पहल जिंदगी कुछ इस शक्‍ल में उसके सामने आई कि उन्होंने दुनिया की रंगीनियत को बेरहमी से ठुकराया दिया. जैसे लगता हो कि वो खुद अपने ही फिल्म ‘प्यासा का गीत ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है..’ गुनगुनाने से ज्यादा निभाने पर अड़े हों.’

बचपन का वो उदास-गुमसुम बच्‍चा एक दिन ‘प्‍यासा’ के विजय और ‘कागज के फूल’ के असफल निर्देशक ‘सिन्हा साहब’ के रूप में हमारे सामने आता है और हम आश्‍चर्यचकित से देखते रह जाते हैं. साहित्यिकता और रचनात्‍मकता के बीज बहुत बचपन से ही उनके भीतर मौजूद थे. बत्‍ती गुल होने पर गुरुदत्‍त बचपन में दीये की टिमटिमाती लौ के सामने अपनी उँगलियों से दीवार पर तरह-तरह की आकृतियाँ बनाते थे. उन दिनों यह उनके छोटे भाइयों आत्‍माराम और देवीदास और बहन ललिता के लिए सबसे मजेदार खेल हुआ करता था. गुरुदत्‍त एक मेधावी विद्यार्थी थे, लेकिन अभावों के चलते कभी कॉलेज न जा सके. उदयशंकर की नृत्‍य मंडली में उन्‍हें बड़ा रस आता था. 1941 में मात्र 16 वर्ष की आयु में गुरुदत्‍त को उदयशंकर के अल्‍मोड़ा स्थिति इंडिया डांस सेंटर की स्‍कॉलरशिप मिली. पाँच वर्ष के इस वजीफे में प्रति वर्ष 75 रु. मिलने वाले थे, जो उस दौर के हिसाब से बड़ी बात थी लेकिन यह शिक्षा अधूरी रह गई. पूरी दुनिया उस समय गहरी उथल-पुथल के दौर से गुजर रही थी. भारत में आजादी की लड़ाई जोरों पर थी और वैश्विक पटल पर द्वितीय विश्‍व युद्ध की गहमागहमी का ज्वलंत माहौल था. उदयशंकर को मजबूरन अपना स्‍कूल बंद करना पड़ा और गुरुदत्‍त घरवालों को ये बताकर कि कलकत्‍ते में उन्‍हें नौकरी मिल गई है, 1944 में कलकत्‍ता चले गये.

लेकिन बेचैन चित्‍त को चैन कहाँ. उन्हें एक टेलीफोन ऑपरेटर नहीं, ‘प्‍यासा’ और ‘कागज के फूल’ का निर्देशक होना था. उसी वर्ष प्रभात कंपनी में नौकरी करने वे पूना चले आए और यहीं उनकी मुलाकात देवानंद और रहमान से हुई. गुरुदत्‍त ने फिल्‍म ‘हम एक हैं’ से बतौर कोरियोग्राफर अपने फिल्‍मी सफर की शुरुआत की. फिर देवानंद की फिल्‍म ‘बाजी’ से निर्देशक की कुर्सी सँभाली. तब उनकी उम्र मात्र 26 वर्ष थी. उसके बाद ‘आर-पार’, ‘सीआईडी’, ‘मि. एंड मिसेज 55’ जैसी फिल्‍में गुरुदत्‍त के फिल्‍मी सफर के तमाम पड़ाव थे, लेकिन वह महान कृति अब भी समय के गर्भ में छिपी थी, जिसे आने वाले समय में एक संजीदा इन्सान; हिंदी सिनेमा के इतिहासपथ पर मील के पत्थरों की तरह गाड़ देने वाला था.

19 फरवरी, 1957 को ‘प्‍यासा’ रिलीज हुई. यकीन करना मुश्किल था कि ‘आर-पार’ और ‘मि. एंड मिसेज 55’ के टपोरी नायक के भीतर ऐसा बेचैन कलाकार छिपा बैठा है. यह फिल्‍म आज भी बेचैन करती है और हरपल मरते हुए समय से जिंदा संवाद करती है. ‘प्‍यासा’ के बिंबों में जैसे गुरुदत्‍त उस दौर और उसमें इंसानी जिंदगी के तकलीफदेह यथार्थ को रच रहे थे, वैसा उसके बाद फिर बमुश्किल ही संभव हो पाया. ‘प्‍यासा’ के दो वर्ष बाद ‘कागज के फूल’ आई जो बहुत हद तक गुरुदत्‍त की असल जिंदगी थी. ‘कागज के फूल’ एक असफल फिल्‍म साबित हुई. दर्शकों ने इसे सिरे से नकार दिया और गुरुदत्‍त फिर कभी निर्देशक की उस कुर्सी पर नहीं बैठे, जिस पर बैठे-बैठे फिल्‍म ‘कागज के फूल’ के नायक सुरेश सिन्‍हा की मौत हो जाती है.

गुरुदत्त की फ़िल्म प्यासा को टाइम मैगज़ीन ने विश्व की 100 सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में स्थान दिया. 2002 में साइट और साउंड के क्रिटिक्स और डायरेक्टर्स के पोल में गुरुदत्त की दो फ़िल्मों ‘प्यासा’ और ‘कागज़ के फूल’ को सर्वकालिक 160 महानतम फिल्मों में चुना गया. ‘कागज के फूल’ एक महान फिल्‍म थी, कुछ मायनों में ‘प्‍यासा’ से भी आगे की कृति. गुरुदत्‍त का निर्देशन, अबरार अलवी के संवाद, वी.के. मूर्ति की सिनेमेटोग्राफी और एस. डी. बर्मन का संगीत. दिग्‍गजों का ऐसा संयोजन गुरुदत्‍त के ही बूते की बात थी. इस फिल्‍म की असफलता बहुत चौंकाती नहीं है. हिंदुस्‍तान जैसे देश में शायद यही मुमकिन था. ‘प्‍यासा’ को भारत से ज्‍यादा सफलता विदेशों में मिली. फ्राँस की जनता ने जिस पागलपन के साथ ‘प्‍यासा’ का स्‍वागत किया, वह खुद गुरुदत्‍त के लिए भी उम्‍मीद से परे था. गुरुदत्‍त की सिनेमाई समझ और उनके भीतर का कलाकार बेशक महान थे, लेकिन हमारे देश में एक कम उम्र युवक की दुखद मौत उसकी प्रसिद्धि का कारण ज्‍यादा बनी, न कि उसकी अपराजेय प्रतिभा.

“गुरुदत्‍त के लिए जीवन बहुत आसान नहीं रहा. उनके भीतर एक अतृप्‍त कलाकार की छटपटाहट थी तो बाहर अवसादपूर्ण दांपत्‍य और प्रेम की गहन पीड़ा और इर्दगिर्द तोड़ देने वाला अकेलापन. गुरुदत्त का अंतिम समय बेहद कठिन त्रिकोण और संवादहीनता का दलदल साबित हुआ. एक तरफ वहीदा रहमान की दोस्ती और दूसरी तरफ अर्धांगिनी गीता जी से दूरी ने उन्हें लगातार खुद में ही समाते जाने को मजबूर कर दिया. सारे मुम्बईया तिलिस्म के बावजूद वे अपने बच्चों से बेहद प्यार करते थे और अंतिम रात से पहले उन्होंने गीता दत्त जी से कई बार बच्चों को अपने पास भेजने की गुजारिश की थी. अकेलेपन के ऐसे ही क्षणों में उन्‍होंने अपना जीवन खत्‍म कर लिया, संसार छूट गया और यहाँ के सारे गम भी. लेकिन उन्‍हें जानने वाले ये कभी समझ ही न सके कि अकेलेपन और अवसाद का वह कैसा सघनतम क्षण रहा होगा जब गुरुदत जैसे संवेदनशील कलाकार को दुनिया से मुंह मोड़ लेना ही एक मात्र रास्ता सुझा.”

एक व्‍यावहारिक और चालबाज दुनिया उन्‍हें कभी नहीं समझ सकी. ‘कागज के फूल’ की असफलता को गुरुदत्‍त स्‍वीकार नहीं कर सके. उसके बाद भी उन्‍होंने दो फिल्‍में बनाईं, लेकिन निर्देशन का बीड़ा कभी नहीं उठाया. ‘कागज के फूल’ दर्शकों की संवेदना के दायरे में घुसी, लेकिन पहले नहीं, बल्कि गुरुदत्‍त की मौत के बाद. जीते जी जिसे कोई पहचान नहीं पाया और उनकी मौत ने उन्हें नायक बना दिया.
‘प्‍यासा’ का विजय यूँ ही नहीं इस दुनिया को ठुकराता है उसकी संवेदना इस दुनिया की समझ से परे है. उसे कोई समझता है तो सिर्फ गुलाबो (प्‍यासा की वेश्‍या) और शांति (कागज के फूल की अनाथ लड़की).

गुरुदत्त: निर्देशक-निर्माता 

जिन्दगी का सफ़र...



गुरुदत्त का जन्म 9 जुलाई 1925 को बंगलौर में शिवशंकर राव पादुकोणे व वसन्ती पादुकोणे के यहाँ हुआ था. उनके माता पिता कोंकण के चित्रपुर सारस्वत ब्राह्मण थे. उनके पिता शुरुआत के दिनों में शिक्षक थे जो बाद में एक बैंक में काम करने लगे. माँ एक साधारण गृहिणीं थी जो बाद में किसी स्कूल में अध्यापिका हो गयीं. वसन्ती घर पर प्राइवेट ट्यूशन के अलावा बंगाली उपन्यासों का कन्नड़ भाषा में अनुवाद भी करती थीं. गुरुदत्त ने अपने बचपन के शुरुआती दिन कलकत्ता में गुजारे. उन पर बंगाली संस्कृति की इतनी गहरी छाप पड़ी कि उन्होंने अपने बचपन का नाम वसन्त कुमार शिवशंकर पादुकोणे से बदलकर गुरुदत्त रख लिया.

गुरुदत्त की दादी नित्य शाम को दिया जलाकर आरती करतीं और गुरुदत्त दिये की रौशनी में दीवार पर अपनी उँगलियों की विभिन्न मुद्राओं से तरह तरह के चित्र बनाते रहते. यहीं से उसके मन में कला के प्रति आत्मीयता जागृत हुई. कला परवान चढ़ी और उसे सारस्वत ब्राह्मणों के एक सामाजिक कार्यक्रम में पाँच रुपये का नकद पारितोषक प्राप्त हुआ.जब गुरुदत्त 16 वर्ष के थे उन्होंने 1941 में पूरे पाँच साल के लिये 75 रुपये वार्षिक छात्रवृत्ति पर अल्मोड़ा जाकर नृत्य, नाटक व संगीत की तालीम लेनी शुरू की. 1944 में जब द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण उदय शंकर इण्डिया कल्चर सेण्टर बन्द हो गया गुरुदत्त वापस अपने घर लौट आये. आर्थिक कठिनाइयों के कारण वे स्कूल जाकर अध्ययन तो न कर सके परन्तु पं. रविशंकर के अग्रज उदयशंकर की संगत में रहकर कला व संगीत के कई गुण अवश्य सीख लिये. यही गुण आगे चलकर कलात्मक फ़िल्मों के निर्माण में उनके लिये सहायक सिद्ध हुए.

गुरुदत्त ने पहले कुछ समय कलकत्ता जाकर लीवर ब्रदर्स फैक्ट्री में टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी की लेकिन जल्द ही वे वहाँ से इस्तीफा देकर 1944 में अपने माता पिता के पास मुंबई लौट आये. उनके चाचा ने उन्हें प्रभात फिल्म कम्पनी पूना तीन साल के अनुबन्ध के तहत फिल्म में काम करने भेज दिया. वहीं सुप्रसिद्ध फिल्म निर्माता वी० शान्ताराम ने कला मन्दिर के नाम से अपना स्टूडियो खोल रखा था. यहीं रहते हुए गुरुदत्त की मुलाकात फिल्म अभिनेता रहमान और देव आनन्द से हुई जो आगे जाकर उनके बहुत अच्छे मित्र बने.

देखा जाये तो उनके संघर्ष का यही वह समय था जब उन्होंने लगभग आत्मकथात्मक शैली में प्यासा फिल्म की पटकथा लिखी. मूल रूप से यह पटकथा ‘कश्मकश’ के नाम से लिखी गयी थी जिसका हिन्दी में अर्थ ‘संघर्ष’ होता है. बाद में इसी पटकथा को उन्होंने ‘प्यासा’ के नाम में बदल दिया. यह पटकथा उन्होंने माटुंगा में अपने घर पर रहते हुए लिखी थी.

उन्हें पूना में सबसे पहले 1944 में ‘चाँद’ नामक फिल्म में श्रीकृष्ण की एक छोटी सी भूमिका मिली. 1945 में अभिनय के साथ ही फिल्म निर्देशक विश्राम बेडेकर के सहायक का काम भी देखते थे. 1946 में उन्होंने एक अन्य सहायक निर्देशक पी० एल० संतोषी की फिल्म ‘हम एक हैं’ के लिये नृत्य निर्देशन का काम किया. यह अनुबन्ध 1947 में खत्म हो गया. उसके बाद उनकी माँ ने बाबूराव पै, जो प्रभात फिल्म कम्पनी व स्टूडियो के सी०ई०ओ० थे, के साथ एक स्वतन्त्र सहायक के रूप में फिर से नौकरी दिलवा दी. वह नौकरी भी छूट गयी तो लगभग दस महीने तक गुरुदत्त बेरोजगारी की हालत में माटुंगा बम्बई में अपने परिवार के साथ रहते रहे. इसी दौरान, उन्होंने अंग्रेजी में लिखने की क्षमता विकसित की और इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इण्डिया नामक एक स्थानीय अंग्रेजी साप्ताहिक पत्रिका के लिये लघु कथाएँ लिखने लगे.

गुरुदत्त को प्रभात फिल्म कम्पनी ने बतौर एक कोरियोग्राफर के रूप में काम पर रखा था लेकिन उन पर जल्द ही एक अभिनेता के रूप में काम करने का दवाव डाला गया. केवल यही नहीं, एक सहायक निर्देशक के रूप में भी उनसे काम लिया गया. प्रभात में काम करते हुए उन्होंने देव आनन्द और रहमान से उनके सम्बन्ध बने. उन दोनों की दोस्ती ने गुरुदत्त को फिल्मी दुनिया में अपनी जगह बनाने में काफी मदद की. प्रभात के 1947 में विफल हो जाने के बाद गुरुदत्त बम्बई आ गये. वहाँ उन्होंने अपने समय के दो अग्रणी निर्देशकों अमिय चक्रवर्ती की फिल्म ‘गर्ल्स स्कूल’ में और ज्ञान मुखर्जी के साथ बॉम्बे टॉकीज की फिल्म ‘संग्राम’ में काम किया. बम्बई में ही उन्हें देव आनन्द की पहली फिल्म के लिये निर्देशक के रूप में काम करने की पेशकश की गयी. देव आनन्द ने उन्हें अपनी नई कम्पनी नवकेतन में एक निर्देशक के रूप में अवसर दिया था किन्तु दुर्भाग्य से यह फिल्म फ्लॉप हो गयी. इस प्रकार गुरुदत्त द्वारा निर्देशित पहली फिल्म थी नवकेतन के बैनर तले बनी ‘बाज़ी’ जो 1951 में प्रदर्शित हुई.



गुरुदत्त और परिवार 

 मुझको मेरे बाद जमाना ढूंढेगा...


कोई बड़ा सर्जक जब युवावस्था में ही आत्महत्या कर लेता है तो उसके साथ कई रूमानी कहानियाँ जुड़ जाती हैं और उसके प्रशंसकों का एक बड़ा संप्रदाय सा बन जाता है. लेकिन यह रूमानियत की आस्था हवाई नहीं होती. चालीस बरस पहले सिर्फ 39 बरस की उम्र में ख़ुदकुशी कर लेने वाले गुरुदत्त की वैसी मौत अब सिर्फ़ एक दर्दनाक ब्यौरा बनकर रह गई है, लेकिन उनकी 'प्यासा', 'काग़ज़ के फूल' और 'साहब, बीबी और ग़ुलाम' सरीखी फ़िल्में भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर हैं. बेशक़ ये तीनों बड़ी फिल्में हैं लेकिन गुरुदत्त की प्रारंभिक फिल्मों को भुला देना उनके योगदान की जमीन को भुला देने के बराबर होगा.

एक साफ़-सुथरा, लोकप्रिय और मनोरंजक सिनेमा 1950 के दशक में उभर रहा था, उसमें गुरुदत्त का केन्द्रीय योगदान रहा है. यूँ तो बंगलौर में जन्मे गुरुदत्त की मातृभाषा हिन्दी या उर्दू नहीं थी लेकिन उनकी शिक्षा देश की तत्कालीन सांस्कृतिक राजधानी कोलकाता में हुई, वहीं उनमें कलाओं में रूचि जागी. नृत्य सीखने की इच्छा ने उन्हें नृत्य-विश्वगुरु उदय शंकर से मिलवाया जो उस वक्त भारत की पहली नृत्य-फ़िल्म 'कल्पना' की योजना बना रहे थे. 

इस संयोग से गुरुदत्त का रुझान सिनेमा की ओर गया और मुंबई में बन रही 1945 की फ़िल्म 'बरखारानी' में उन्होंने नृत्य निर्देशन किया साथ ही नायिका के छोटे भाई की एक मामूली भूमिका भी की. देव आनंद की पहली फिल्म 'हम एक हैं' (1946) में भी वे नृत्य-निर्देशक थे. अमित चक्रवर्ती की फिल्म 'गर्ल्स स्कूल' (1949) और ज्ञान मुखर्जी की अपराध फिल्म 'संग्राम' में वे सहायक निर्देशक रहे. मित्र देव आनंद ने अपनी संस्था नवकेतन की दूसरी फ़िल्म 'बाज़ी' (1951) का सम्पूर्ण निर्देशन 26 वर्षीय गुरुदत्त को सौंप दिया. 


इस फ़िल्म की हिरोइन थी सुपरिचित पार्श्वगायिका गीता रॉय, जो बाद में गुरुदत्त की ‘जिन्दगी’ बन गयीं. शादी के बाद वह गीता दत्त हो गईं. उसकी कामयाबी से गुरुदत्त, देव आनंद, संगीतकार सचिन देव बर्मन और गीतकार साहिर लुधियानवी को स्थाई अखिल भारतीय ख्याति मिली. अगली फ़िल्म 'जाल' में इस टीम के साथ गुरुदत्त ने जॉनी वॉकर को भी जोड़ लिया जो आगे चल कर एक साफ-सुथरे हास्य अभिनेता के रूप में स्वीकृत हुए. 1953 की अपने नायकत्व वाली फ़िल्म 'बाज़' इतनी सफल नहीं हुई लेकिन उसके बाद 'आर-पार', 'सीआईडी' और 'मिस्टर एंड मिसेज 55' ज़बरदस्त हिट रही. गुरुदत्त को अब बच्चा-बच्चा जानता था, फ़िल्म-उद्योग में निर्माता-निर्देशक-अभिनेता के रूप में वे स्थापित हो चुके थे. ये वो दशक था जब मोतीलाल, अशोर कुमार, बलराज साहनी, दिलीप कुमार, राजकपूर और देव आनंद सरीखी प्रतिभाएं अपने उत्कर्ष पर थीं.

1945-55 के दस वर्ष गुरुदत्त की उस बहुमुखी तैयारी के वर्ष थे जिसका अंतिम लक्ष्य कुछ बड़ी फिल्में बनाना था. जब दिलीप कुमार वादा करके भी सेट पर नहीं आए तो गुरुदत्त ने स्वयं 'प्यासा' के भावुक, आदर्शवादी, पूंजी-विरोधी कवि की भूमिका संभाल ली. 'प्यासा' का नायक हर तरह के अन्याय, पाखंड और शोषण के विरुद्ध है. उसे किन्हीं जीवन-मूल्यों की प्यास है. एक अवसरवादी, बुर्जुआ प्रेमिका को छोड़कर वह एक वेश्या को चाहने लगता है. अपने धनपिशाच भाइयों से उसे नफ़रत होती है जो उसकी कथित मौत का फ़ायदा उठाना चाहते हैं. निर्देशक गुरुदत्त की दुलर्भ विशेषता यह है कि उनकी फिल्मों में किसी भी पात्र का अभिनय दोयम दर्जे का नहीं होता. 'प्यासा' में गुरुदत्त, वहीदा रहमान, माला सिन्हा और जॉनी वॉकर की बेजोड़ अदाकारी है. वहीदा रहमान तो गुरुदत्त की ही खोज थीं लेकिन फिल्म का जो संदेश था उसे सिर्फ साहिर लुधियानवी के गीतों ने सचिन देव बर्मन की धुनों से संप्रेषित किया. 'प्यासा' के गीत अद्वितीय हो गये. 
उस वक्त साहिर लुधियानवी ने सिर्फ़ फ़िल्म के नायक को ही नहीं, उस युग के करोड़ों भारतीयों की भावनाओं को व्यक्त कर कर दिया था जो आज भी बदस्तूर जारी है!

'प्यासा' की आशातीत सफलता ने शायद गुरुदत्त को दुस्साहसी बना दिया और उनकी अगली और दक्षिण एशिया की पहली सिनेमास्कोप फ़िल्म 'काग़ज के फूल' में वे आत्मकथा में जाते हुए एक ऐसे फिल्म-निर्देशन की कहानी दिखाने का साहस कर बैठते हैं जो प्रेम, परिवार और पेशे तीनों मोर्चों पर असफल रहती है. लेकिन प्रेम, अकेलेपन व उदासी से लरबरेज और उसमें डूब सब कुछ मिटा देने वाले एक फिल्म निर्देशक की एक आत्मकथात्मक कला ने इसे इतिहास के पन्नों में दर्ज कर दिया क्योंकि जिन्दगी के इस पक्ष को दिखाने वाले गुरुदत्त पहले निर्देशक बन गये थे.

यह विषय अपने वक्त से बहुत आगे का है- वह फ्रांस की 'नूवेल बाग' और 'आत्यँय' फिल्मों के नजदीक़ था. यह इतनी निजी और फ़िल्म की दुनिया को उघाड़ने वाली फिल्म थी कि दर्शकों को बेहद असुविधाजनक लगी. अभिनय अच्छा था, लेकिन साहिर के साथ मतभेद हो जाने के बाद एसडी बर्मन, कैफी आज़मी के साथ 'प्यासा' जैसा जादू कर न सके. 'काग़ज के फूल' में गुरुदत्त व्यक्तिगत और पेशेवर दोनों मोर्चों पर मायूस हुए और उन्होंने यह लिखा भी है कि ‘जनता की रुचि पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता’, लेकिन आज वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी सबसे कलात्मक फ़िल्म मानी जाती है.


'साहब, बीवी और गुलाम' के निर्देशन का श्रेय अबरार अलवी को दिया जाता है, ठीक उसी तरह जैसे कि चौदहवीं का चाँद का एम सादिक़ को, लेकिन दोनों फिल्मों में अलवी और सादिक़ के असंदिग्ध योगदान के बावजूद हर फ्रेम पर गुरुदत्त की मुहर लगी साफ दिखती है. और सच तो यह है कि अभिनय, विषय, संगीत, फोटोग्राफी और सांस्कृतिक रचाव-बसाव के मामलों में 'साहब, बीबी और गुलाम' गुरुदत्त की सर्वगुणसम्पन्न फिल्म लगती है. मीना कुमारी का अभिनय देखकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं, रहमान की प्रतिभा को जितना गुरुदत्त पहचानते थे उतना कोई और नहीं, 'चौदहवीं का चाँद' में खुदकुशी से पहले रहमान की जो अदाकारी दिखती है वह गुरुदत्त की पारखी दरियादिली ही थी कि पूरी फिल्म में उन्होंने रहमान के किरदार को खुद पर हावी होने दिया. 

'चौदहवीं का चाँद' बेशक़ एक लोकप्रिय मुस्लिम सोशल फ़िल्म है लेकिन उस हिस्से में भी वह बड़ी फिल्म है. 'मेरे महबूब' उसके आसपास नहीं फटकती, 'साहब, बीबी और गुलाम' अपनी पूर्णता में कालजयी है और बताती है कि एक जटिल, विस्तीर्ण साहित्यिक कृति पर फ़िल्म कैसे बनाई जाती है. 

अफ़सोस यह है कि निर्देशक गुरुदत्त ने अभिनेता गुरुदत्त पर ग्रहण सा लगा दिया. उनमें ग्लैमर नहीं था और उन्हें अपनी फिल्मों से बाहर हमेशा बलराज साहनी और भारत भूषण जैसी भली भूमिकाएँ दी जाती रहीं लेकिन उनके किसी भी किरदार को दोयम दर्जे की अदायगी नहीं कहा जा सकता. दूसरों के लिए अभिनीत उनकी अंतिम चार फिल्में बहूरानी (1963), भरोसा (1963) सांझ और सबेरा(1964) तथा सुहागन (1964) नाकामयाब नहीं रहीं. वे अलीबाबा और चालीस चोर की कहानी पर एक उत्तर-आधुनिक निर्वाह वाली फिल्म बनाना चाहते थे. लेकिन उनकी आत्मा को अनजान हादसों और मायूसियों ने घेर लिया था. उनके असमय और संदिग्द्ध मौत ने गुरुदत्त को निजी मुक्ति तो दे दी लेकिन भारतीय या शायद विश्व-सिनेमा को कई कृतियों से हमेशा के लिए वंचित कर दिया.



जो दुनिया को दिया ..


गुरुदत्त यथार्थवादी कलाकार थे. यथार्थपरक नहीं. जो वैचारिक प्रतिबद्धता गुरुदत्त में थी, वो उस दौर के कई फिल्मकारों में थी लेकिन समय के झंझावतों में कईयों ने अपने चोले बदल दिए पर गुरुदत्त कभी न बदले. जिस व्यवस्था के खिलाफ गुरुदत्त लड़ रहे थे, उसके अपने खतरे थे. गुरुदत ने अपनी फिल्मों में शुरू से आखिर तक सामाजिक सम्बद्धता की छाप छोड़ी. उनकी फ़िल्में सामाजिक रूढियों और मान्यताओं के प्रति बगावती रुख अख्तियार करती हैं, उनकी फ़िल्म दिमाग से नफे-नुकसान का आकलन करते हुए नहीं बल्कि दिल के रस्ते, संवेदनाओं के सागर में कहीं गुम हो जाने में अपनी सपूर्णता ढूढती हैं. बाजारभाव के इस दौर में जिसको सहेजना रोटी-दाल और अपनी सांसो में किसी एक को चुनने के बराबर है.

कई सौ वर्षों की गुलामी झेलने वाले तीसरी दुनिया के एक गरीब मुल्‍क और एक सामंती भाषा में रचे जा रहे सिनेमा की अपनी वस्‍तुगत सच्‍चाइयाँ थीं. जबकि गुरुदत्‍त इस यथार्थ से बहुत आगे थे. विचारों के लिए जीना और वह भी हिन्दी फिल्मों के बाजार में, एक असाध्य पीड़ा को जन्म देता है. जबकि इन सबको स्थापनाएं देने वाला हिन्दी फिल्मों का दर्शक; बिना कोई ख़िताब पाये कलाकार को भुला देने का आदी रहा है. मीडिया की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है. मीडिया फिल्मों और फिल्मकारों की ऐसी संगिनी रहा है, जो चाहे-अनचाहे किसी भी फिल्म को, किसी भी अदाकार को लोक और अ-लोक के शिखर-पाताल में जगह दे देती है. शायद इसीलिए ‘कागज के फूल’ के सिन्हा साहब (गुरुदत्त) को उनके स्टूडियो के कर्मचारी भी नहीं पहचान पाए थे.

गुरुदत्‍त अपने वक्‍त से बहुत आगे के कलाकार थे. मुंबईया सिनेमा की जिन सीमाओं के बीच वे अपनी कालजयी कृतियाँ रच रहे थे, वह अपने आप में एक गहरी रचनात्‍मक तड़प को दर्शाती है. वह तड़प, जो जिंदगी के छूटने के साथ ही छूटी. शायद पूरी तरह छूटी भी नहीं, जो अपने पीछे एक तड़प छोड़ गई. वही तड़प, जो आज भी ‘प्‍यासा’ और ‘कागज के फूल’ को देखते हुए हमें अपने भीतर महसूस होती है. एक तड़प, जो सुंदर फूलों की ‘प्‍यास’ में भटक रही है, लेकिन जिसके हिस्‍से आती है, सिर्फ ‘कागज के फूल’... जिसमें कोई मादक सुगंध नहीं बल्कि है.. एक बदसूरत महक जो दिलोदिमाग को दर्द के गहरे सागर के मुहाने तक खिंच ले जाती है.

- अमृत सागर 

(कभी किसी सेमेस्टर के लिए लिखा गया एक असाइनमेंट)

सोमवार, 21 जुलाई 2014

बलराज साहनीः ‘पूरी दुनिया’ का चेहरा

बलराज साहनी
कभी सोवियत संघ के एक मशहूर निर्माता ने कहा था कि 
‘बलराज साहनी के चेहरे पर एक पूरी दुनिया दिखाई देती है.’ 
बलराज साहनी ने उसके कुछ दिनों बाद ही आनन्द बाजार पत्रिका में लिखा कि 
"यह ‘पूरी दुनिया’ उस रिक्शेवाले की थी और शर्म की बात यह है कि आजादी के 25 साल बाद भी वह चेहरा नहीं बदला है." 

विभाजन की दिवारों में चिन दिए गये दिली हर्फों को महसूस कर चुके बलराज साहनी के व्यक्तित्व को समझने के लिए यह लाइनें काफी हैं. लेकिन फिल्म ‘दो बिघा जमीन’ का यह रिक्शेवाला जो अपने संजीदा अभिनय से भारतीय दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ चुका था केवल अभिनेता ही नहीं रहा, उन्होने जिन्दगी के कोरस पर कथाकार, शिक्षक, रंगकर्मी, संस्मरण और यात्रा-लेखक की भुमिका भी बखूबी निभाई.

विभाजन पर आधारित एमएस सथ्यू की मशहूर फिल्म गर्म हवा की चर्चित आखिरी पंक्ति ‘इंसान कब तक अकेला जी सकता है’ किसी और की नहीं, बल्कि फिल्म के मुख्य अभिनेता बलराज साहनी की ही रची हुई थी. 1973 की इस प्रसिद्ध फिल्म के साथ ही यह वर्ष ‘काबुलीवाला’ और ‘धरती के लाल’ जैसी प्रसिद्ध फिल्मों के अभिनेता बलराज साहनी की जन्मशती का वर्ष भी है. दुर्भाग्यवश साहनी की मौत फिल्म गर्म हवा की डबिंग खत्म करने के अगले ही दिन हो गई थी. इस कारण वे कभी गर्म हवा देख नहीं सके. 

बलराज साहनी ने 1913 में रावलपिंडी(अब पाकिस्तान में) के एक मध्यमवर्गीय व्यवसायिक परिवार में जन्म लिया था. लेकिन उनकी प्रतिभा ने उन्हे इतिहास के पन्नों में मील का पत्थर बना के दर्ज कर दिया. लाहौर से अंग्रेजी में एमए करने के बाद बलराज साहनी रावलपिंडी लौट गये और पिता के व्यापार में उनका हाथ बंटाने लगे. 1930 के अंत मे बलराज साहनी और उनकी पत्नी दमयंती रावलपिंडी को छोड़कर रवीन्द्र नाथ टैगोर के शांति निकेतन पहुंचें जहां बलराज साहनी अंग्रेजी के शिक्षक नियुक्त हो गये.

1938 में कुछ समय बलराज साहनी ने महात्मा गांधी के साथ भी काम किया. इसके एक वर्ष के पश्चात महात्मा गांधी के सहयोग से बलराज साहनी को बी.बी.सी के हिन्दी उदघोषक के रूप में इग्लैंड में नियुक्ति मिल गयी. लगभग पांच वर्ष के इग्लैंड प्रवास के बाद वह 1943 में भारत लौट और इप्टा (इंडियन प्रोग्रेसिव थियेटर एसोसियेशन) ज्वाइन कर लिया. इप्टा में वर्ष 1946 में उन्हें सबसे पहले फणी मजमूदार के नाटक ‘इंसाफ’ में अभिनय करने का मौका मिला. इसके साथ ही ख्वाजा अहमद अब्बास के निर्देशन में इप्टा की ही निर्मित फिल्म ‘धरती के लाल’ में भी बलराज साहनी ने बतौर अभिनेता काम किया.

इप्टा से जुडे रहने के कारण बलराज साहनी को कई कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ा. उन्हें अपने क्रांतिकारी और कम्युनिस्ट विचारों के कारण जेल भी जाना पडा. उन दिनों वह फिल्म ‘हलचल’ की शूटिंग में व्यस्त थे और निर्माता के आग्रह पर विशेष व्यवस्था के तहत फिल्म की शूटिंग किया करते थे. शूटिंग खत्म होने के बाद वापस जेल चले जाते थे. वर्ष 1953 मे बिमल राय के निर्देशन मे बनी फिल्म दो बीघा जमीन बलराज साहनी के कैरियर में अहम पड़ाव साबित हुई. इस फिल्म के माध्यम से उन्होंने एक रिक्शावाले के किरदार को जीवंत कर दिया. रिक्शावाले को फिल्मी पर्दे पर साकार करने के लिये बलराज साहनी ने कलकत्ता की सड़को पर 15 दिनों तक खुद रिक्शा चलाया और रिक्शेवालों की जिंदगी को जिया. वर्ष 1961 में प्रदर्शित फिल्म ‘काबुलीवाला’ में भी बलराज साहनी ने अपने संजीदा अभिनय से दर्शको को भावविभोर कर दिया. उनका मानना था कि पर्दे पर किसी किरदार को साकार करने के पहले उस किरदार के बारे मे पूरी तरह से जानकारी हासिल की जानी चाहिये. इसीलिये वह बम्बई में एक काबुलीवाले के घर; लगभग एक महीने तक रहे. 

बहुमुखी प्रतिभा के धनी बलराज साहनी अभिनय के साथ-साथ लिखने में भी काफी रूचि रखते थे. वर्ष 1960 में अपने पाकिस्तानी दौरे के बाद उन्होंने ‘मेरा पाकिस्तानी सफरनामा.’ और वर्ष 1969 में तत्कालीन सोवियत संघ के दौरे के बाद ‘मेरा रूसी सफरनामा’ किताब लिखी. बलराज साहनी ने ‘मेरी फिल्मी आत्मकथा’ किताब के माध्यम से लोगों को खुद से रूबरू भी कराया. सदाबहार अभिनेता देवानंद निर्मित फिल्म ‘बाजी’ की पटकथा भी बलराज साहनी ने ही लिखी थी. बलराज साहनी के उल्लेखनीय फिल्मों को याद करते हुए कुछ और भी नाम गिनाये जा सकते हैं जैसे हमलोग, गरम कोट, सीमा, वक्त, कठपुतली, लाजवंती, सोने की चिडिया, घर-संसार, सट्टा बाजार, भाभी की चूडि़या, हकीकत, दो रास्ते, एक फूल दो माली, मेरे हमसफर आदि. 

वर्ष 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘लाल बत्ती’ का निर्देशन भी बलराज साहनी ने किया था. निर्देशक एम.एस.सथ्यू की वर्ष 1973 मे प्रदर्शित ‘गर्म हवा’ बलराज साहनी की फिल्मो में से सबसे अधिक याद की जाने वाली कृतियों में से एक रही है. विभाजन के दौर में भारतीय मुसलमानो के पाकिस्तान पलायन की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में बलराज साहनी केन्द्रीय भूमिका में हैं. इस फिल्म में उन्होंने जूता कारखाना चलाने वाले एक रईस मगर परेशान कारोबाारी की भूमिका अदा की है. जिसे यह फैसला लेना है कि वह हिन्दुस्तान में रहे अथवा नये बने पाकिस्तान की ओर पलायन कर जाये. अगर दो बीघा जमीन को छोड दे तो बलराज साहनी के फिल्मी कैरियर की सबसे बेहतरीन अदाकारी वाली फिल्म गर्म हवा ही रही. जिसने उन्हे सदियों के लिए अमर कर दिया. 


13 अप्रैल 1973 के दिन अपने संजीदा अभिनय से आंखों को नम कर देने वाले इस कलाकार ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. लेकिन ता-जीन्दगी इस संजीदा कलाकार की सामाजिक सोच पर महत्वाकांक्षा कभी न हावी हो पायी. शायद इसलिए ही उन्होने कभी ‘अभिनय का बाजार’ बनने की नहीं सोची. तभी उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता के आगे फिल्मी दुनिया की चमक-दमक बौने साबित हुए. और वे अकेले ही जिम्मेदार राहों के हमराही बने रहे.


-अमृत सागर

(2013 में बनारस फिल्म फेस्टिवल के ब्रोसर के लिए लिखा गया लेख )

गुरुवार, 3 जुलाई 2014

आज ही के दिन कुलभूषण पंडित उर्फ "राजकुमार" इस दुनिया के फ़ानूसखाने से पिघल गया था...

 
-चिनॉय सेठ,
जिनके घर सीसे के बने होते हैं वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकते..
(फिल्म 'वक्त')

-हमारी जुबान भी हमारी गोली की तरह है, दुश्मन से सीधी बात करती है..
 (फिल्म 'तिरंगा')

-हम आंखो से सुरमा नहीं चुराते, हम आंखें ही चुरा लेते हैं...  
(फिल्म 'तिरंगा')
 
-हम तुम्हें मारेंगे और जरूर मारेंगे..
 लेकिन वह वक्त भी हमारा होगा, बंदूक भी हमारी होगी और गोली भी हमारी होगी..
(फिल्म 'सौदागर')
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मैं जानता हूँ ! इन लाईनों के बाद किसी नाम और तार्रुफ़  की जरुरत नहीं पड़ेगी…
3 जुलाई 1996, कैलेंडरों में आज के ही दिन रुपहले परदे का एक अजीम साहाकार कुलभूषण पंडित उर्फ "राजकुमार" इस दुनिया के फ़ानूसखाने से पिघल गया। जिसके अदाकारी ने बीते कई बरसों में हमारे दिलों पर अपने अंदाज की एक अनोखी नक्काशी टाँकी दी थी। जिसकी खूबसूरती कई सदियों तक 'सपनीले पर्दे' की मायावी दुनिया में अपने खास अंदाज में तैरती रहेगी… जिसमें झक्क सफ़ेद लिबास था तो बार-बार ओठों से लगने वाली सिगार भी थी। गले से लगा रहने वाला स्कार्फ था तो अक्सर जुबां पर तैरते रहने वाला 'जानी' का सम्बोधन भी.… पर सोचता हूँ ऐसे अल्फाज जिस ज़ुबान से निकले होंगे, क्या वह भी लड़खड़ाई होगी ! 
जो अपने निभाए साहाकारों में दुनिया भर के सख्त लोहे के साथ अपने मीनारों पर इतराते तुर्शीबाजों की खिड़कियों के सजीले सीसे जज्ब कर चूका हो.....  आखिर वह अपने अंतिम वक्त में क्या सोचता होगा ?
 
 
शायद! अपने अंतिम समय में नितांत अकेले हो चुके राजकुमार ने यह महसूस कर लिया था कि उनका 'वक्त' अब काफी करीब है, इसीलिए अपने पुत्र पुरू राजकुमार को उन्होंने अपने पास बुला कर कहा कि देखो मौत और जिंदगी इंसान का निजी मामला होती हैं इसलिए मेरी मौत के बारे में मेरे मित्र चेतन आनंद के अलावा किसी और को नहीं बताना... मेरा अंतिम संस्कार करने के बाद ही किसी और को बताना !
यह तो फिल्मों की मायावी दुनिया का एक रुखा सच है कि अपने अंतिम दिनों में ऊँची से ऊँची मीनार भी यहां एक दम खाली हो जाती है। जीवन के एकाकी कैनवास पर रूखी और बेजार तस्वीरें उभरने लगतीं हैं और सर-आँखों पर बिठाये रखने वाला भारतीय समाज बिसराने लगता है।  
 
खैर ! उस अजीम साहकार को याद करते हुए उसकी इबारतों को याद करते हैं। 
संवाद अदायगी के बेताज बादशाह राजकुमार का जन्म आजादी के पहले 8 अक्टूबर 1926 को पाकिस्तान के बलूचिस्तान में  हुआ था। राजकुमार ग्रेजुएशन करने के बाद मुंबई के माहिम पुलिस स्टेशन में सब इन्स्पेक्टर के रूप में काम कर रहे थे। यहीं उनकी मुलाकात फिल्म निर्माता बलदेव दुबे से हुई। जो राजकुमार के बातचीत के अंदाज से काफी प्रभावित हुए और उन्होंने राजकुमार से अपनी फिल्म "शाही बाजार" में अभिनेता के रूप में काम करने की पेशकश की। यहीं शुरू होती है अपने तरह के एक अकेले राजकुमार की बिल्कुल फ़िल्मी कहानी। साथ ही एक बात का जिक्र बेहद जरुरी है और वह राजकुमार के अक्खड़ अंदाज का.. जो उनकी स्टाइल और एक्टिंग की तरह ही अनोखा था। राजकुमार अपने साहाकारों में ही नहीं अपनी असल जिंदगी में भी सेल्फ रिस्पेक्ट के लिए जीते रहे। ऐसे सैकड़ों किस्से फिल्म इंडस्ट्री में आज भी मशहूर हैं। 
 
वैसे फिलहाल उनके अभिनय जगत से ही रू-ब-रू होते हैं। 
1952 मे "रंगीली" में एक छोटी सी भूमिका करने के बाद राजकुमार लगातार कई फिल्मों में दिखाई दिए। लेकिन 1957 मे आयी महबूब खान की फिल्म "मदर इंडिया" के जरिये राजकुमार ने गांव के एक किसान की भूमिका में जबरदस्त छाप छोड़ी। इस फिल्म से वह इंडस्ट्री में अभिनेता के रूप में स्थापित हो गए।
इसके बाद 1959 मे रिलीज हुई फिल्म "पैगाम" में उनके सामने हिन्दी फिल्म जगत के एक्टिंग किंग दिलीप कुमार थे लेकिन राजकुमार ने यहां भी अपने अंदाज में दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी। इसके बाद दिल अपना और प्रीत पराई, घराना, गोदान, दिल एक मंदिर और दूज का चांद जैसी फिल्मों के जरिए दर्शकों के बीच अपने अभिनय की रौशनी बिखेर दी। 
बी. आर. चोपड़ा की फिल्म वक्त में राजकुमार का बोला गया संवाद "चिनाय सेठ" जिनके घर शीशे के बने होते है वो दूसरों पे पत्थर नहीं फेंका करते, दर्शकों के बीच आज भी लोकप्रिय है। इसी तरह उस दौर में पाकीजा में  बोला गया उनका डायलॉग  "आपके पांव देखे बहुत हसीन हैं इन्हें जमीन पर मत उतारिएगा मैले हो जायेगें" इस कदर लोक प्रिय हुआ कि लोग गाहे बगाहे उनकी आवाज की नकल करने लगे।
उन्होंने हमराज, नीलकमल, मेरे हुजूर, हीर रांझा और पाकीजा जैसी फिल्मों की रूमानी भूमिकाएं भी स्वीकारीं तो वर्ष 1978 मे आयी फिल्म "कर्मयोगी" के जरिये राज कुमार ने अपने दो रूपों के कारण दर्शकों के दिलों में अपने नाम की एक कील ही ठोंक दी। 
 

वर्ष 1991 में सुभाष घई की फिल्म सौदागर में राज कुमार वर्ष 1959 मे प्रदर्शित फिल्म "पैगाम" के बाद दूसरी बार दिलीप कुमार के साथ काम किया। फिल्म में एक्टिंग की दुनिया के दो महारथियों का साथ देखने लायक है।  लेकिन नब्बे के दशक के अंतिम सालों में राजकुमार ने फिल्मों मे काम करना बहुत कम कर दिया। इस दौरान उनकी तिरंगा, पुलिस और मुजिरम, इंसानियत के देवता, बेताज बादशाह, जवाब, गॉड और गन जैसी फिल्में रिलीज हुईं। जिसमें से तिरंगा तो आज भी देश-भक्ति से भरे राष्ट्रीय दिवसों पर टेलीविजन पर 'फहरता' रहता है।
 
बावजूद 'रंगीली' फिल्म के बाद  राजकुमार ने पचास से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया। जिनमें से कुछ प्रमुख फिल्मों के अलावा दुल्हन, जेलर, दिल अपना और प्रीत पराई, अर्धांगिनी, उजाला, घराना, दिल एक मंदिर, फूल बने अंगारे, दूज का चांद, प्यार का बंधन, ज़िन्दगी, काजल, लाल पत्थर, ऊंचे लोग, नई रौशनी, मेरे हुज़ूर,  वासना, हीर-रांझा, कुदरत, मर्यादा, हिंदुस्तान की कसम। अपने जीवन के आखिरी वर्षों में उन्हें कर्मयोगी, चंबल की कसम, धर्मकांटा, जवाब आदि फ़िल्में की। 
 
पूरी इबारत के बाद अब यह कहना कत्तई मुगालता नहीं होगा कि अब राजकुमार जैसे अक्खड़ अभिनेता इस दुनिया में कभी नहीं आएंगे……  
 
 
 -अमृत सागर 

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

बलराज साहनी: मानवीय संघर्ष और संवेदनाओं का चितेरा

-दीवानसिंह बजेली
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बलराज साहनी 
एक ऐसे अभिनेता के रूप में, जो व्यावसायिक फिल्मों से जुड़ा होने के बावजूद अपनी प्रतिबद्धता में अटल रहा बलराज साहनी की तुलना हॉलिवुड और ब्रितानवी व्यवसायिक सिनेमा के चार्ली चेपलिन, वेनेसा रोडग्रेव और राबर्ट रेडफोर्ड जैसे अभिनेताओं से की जा सकती है। हिंदी फिल्मों को उन्होंने यथार्थवादी अभिनय की एक ऐसी शैली दी जो विशिष्ट है।


यह सुखद संयोग है कि भारतीय सिनेमा और अभिनेता बलराज सहानी का जन्म एक ही माह और एक ही वर्ष हुआ। अपने आप में यह विडंबना है कि आज जब भारतीय सिनेमा इतना विशाल रूप धारण कर चुका है और अपनी यात्रा के सौ वर्ष मना रहा है वह और उसके प्रशंसक उस महान अभिनेता को भूल गए हैं जिसने अपने अभिनय से भारत की शोषित और दमित जनता के दुख-दर्द को सिनेमा के पर्दे पर साकार किया। इससे बड़ी दुख और शर्म की बात क्या हो सकती है कि दिल्ली में 25 से 30 अप्रैल तक चलने वाले सरकारी स्तर पर हो रहे समारोह में बलराज सहानी की न तो कोई फिल्म दिखलाई गई और न ही उन्हें याद किया गया। क्या यह ऐसा अवसर नहीं था जब यथार्थवादीवादी परंपरा की हिंदी व्यावसायिक सिनेमा की सबसे बड़ी देन दो बीघा जमीन को दिखाया जान चाहिए था?
बलराज साहनी का भारतीय फिल्मों के इतिहास में अपनी मानवीय संवेदनाओं और किसान-मजदूर के हमदर्द के रूप में एक अभिनेता के तौर पर अद्वितीय स्थान है। कलाकार के रूप में अपनी उपलब्धि के चरम पर पहुंचने के बवजूद न तो वह अपनी जड़ों को भूले और न ही भारत के संघर्षरत आम आदमी को। उनका जीवन एक ऐसे कलाकार का रहा जिसने समाज के प्रति अपने दायित्व का सच्चाई से निर्वहन किया। जनता के कठोर जीवन की वास्तविकता को अपनी कला में आत्मसात करने के लिए उन्होंने उनके संघर्षमय जीवन से तादात्म्य स्थापित किया। यही कारण है कि उनके चरित्र जैसे शंभू महतो (दो बीघा जमीन), पोस्ट ऑफिस का क्लर्क (गर्म कोट), एक मुस्लिम व्यापारी (गर्म हवा) व पठान (काबुलीवाला) चिरस्मरणीय हैं। वह ऐसे कलाकार थे जो जीवन और कला के पारस्परिक अंतर्संबंधों के अंतद्र्वंद्वों को कलात्मक स्वरूप देने के लिए कटिबद्ध रहे और वास्तविकता की सच्चाई को व उसके आंतरिक अंतद्र्वंद्वों को निरंतर प्रतिपादित करते रहे।
बलराज साहनी का जन्म 1 मई, 1913 को रावलपिंडी में हुआ, जो अब पाकिस्तान में है—उनका नाम वास्तविक नाम युधिष्ठिर था। उनके पिता एक कर्मठ व्यक्ति थे, क्लर्क की नौकरी छोड़कर एक अच्छे जीवन की तलाश में व्यापारी बन गए और समाज में एक संपन्न व आर्य समाज के अनन्य अनुयायी के रूप में जाने जाते थे। उनकी दो बहनें व एक भाई (लेखक व कलाकार भीष्म साहनी) थे। पढ़ाई में वह प्रखर थे।
ज्यों-ज्यों वह बड़े होते गए और उच्च शिक्षा प्राप्त करते गए अपने पारिवारिक पुरातनपंथी विचारों के विरोधी बनते गए। उनके विचारों में उस समय एक नया मोड़ आया जब उन्होंने रावी नदी के किनारे इंडियन नेशनल कांगे्रस के 1929 के ऐतिहासिक अधिवेशन को देखा। इस अधिवेशन में जवाहरललाल नेहरू ने पूर्ण आजादी प्राप्त करने की घोषणा की थी।
अगली घटना जिसने युवा बलराज को गहरे प्रभावित किया वह थी—ब्रिटिश सरकार द्वारा भगत सिंह व उनके कॉमरेडों को फांसी देने की। इस जघन्य व अमानवीय अपराध के प्रति ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध देशव्यापी आक्रोश की लहर फैली। बलराज पर इस लहर का गहरा असर पड़ा। कॉलेज के दिनों से ही बलराज का रुझान साहित्य व नाटकों की ओर बढ़ता गया। बलराज के जीवन दर्शन में, उनके प्रगतिशील चिंतन में व उनकी शोषित जनता के संघर्ष के प्रति आस्था में एक क्रांतिकारी परिवर्तन तब आया जब वह बीबीसी (रेडियो) में उद्घोषक के कार्यकाल की समाप्ति पर मुंबई आए और उन्होंने इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोशियेशन (इप्टा) में अपनी पत्नी दमयंती के साथ नाटकों में काम करना शुरू कर दिया। इसी के साथ उनके विचारों पर मार्क्सवाद-लेनिनवाद का असर बढ़ता गया।
मुंबई इप्टा में प्रवेश करते ही उनका संपर्क ख्वाजा अब्बास से हुआ। उस समय अब्बास साहब के नाटक जुबेदा की रीडिंग चल रही थी और इसका निर्देशन स्वयं उन्होंने करना था। हालांकि उस समय उन दोनों का विशेष परिचय नहीं था। बलराज ने लंदन में उनकी कुछ कहानियां अवश्य पढ़ी थी। अचानक अब्बास ने घोषणा की :
”दोस्तो, मुझे खुशी है कि आज बलराज साहनी हमारे बीच में है। मैं इस नाटक को उन्हें इस आशा के साथ सौंपता हूं कि वह इसका हमारे लिए निर्देशन करेंगे।”
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बलराज ने जुबेदा का निर्देशन बड़े जोश व सफलता के साथ किया। इस नाटक की प्रस्तुति के साथ ही दोनों के बीच गहरी निकटता बन गई। वास्तव में यह नाटक बहुत लोकप्रिय हुआ जो एक मुस्लिम लड़की व उसके परिवार के निजी संघर्ष को बृहद जन संघर्ष के परिपे्रक्ष्य में प्रतिपादित करता है। अब्बास ने धरती के लाल फिल्म में बलराज साहनी को मुख्य भूमिका में रखा और साथ ही उनकी पत्नी दमयंती ने भी इस फिल्म में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। बलराज ने इप्टा के कई नाटकों में काम किया जिनमें महत्त्वपूर्ण है—इंसपेक्टर जनरल।

दुर्भाग्यवश दमयंती की 28 वर्ष की आयु में अचानक मृत्यु हो गई और वह अपने पीछे दो बच्चे छोड़ गईं। बलराज पर जैसे बज्रपात हो गया। पर धीरे-धीरे उन्होंने अपने नैराश्य, अकेलेपन व असाध्य दुख का इप्टा की गतिविधियों व रचनात्मक कार्यों में लग कर सामना किया।
बलराज को बॉलीवुड में अपनी जगह बनाने के लिए विकट संघर्ष करना पड़ा। एक अभिनेता के रूप में वह अपनी कला में उच्च स्तर प्राप्त करना चाहते थे। उनकी शैली यथार्थवाद पर आधारित थी। जबकि बॉलीवुड में लगातार मनोरंज और रोमांस का बोलबाला होता जा रहा था। अंतत: वह स्वयं को बॉलीवुड में एक महान कलाकार के रूप में स्थापित करने में सफल हो पाए। उन्होंने 135 फिल्मों में अभिनय किया—धरती के लाल, दो बीघा जमीन, गर्म कोट व गर्म हवा भारतीय सिने जगत की कालजयी कृतियां हैं। इन फिल्मों में बलराज अपने चरित्रों के माध्यम से गहनता, सजीवता, जीवंतता व संवेनशीलता का अद्वितीय सम्मिश्रण कर दर्शकों के हृदयों में अमिट छाप छोड़ते हैं। ये चरित्र हमारे समाज के प्रतिनिधि व परिचित हैं जिनसे दर्शक एक सहज तादात्म्य स्थापित कर लेता है। यथार्थवाद और संवेनशीलता उनकी कला की शक्ति है। उन्होंने सीमा (1955) व सोने की चिडिय़ा (1958) में चिरस्मरणीय चरित्रों का किरदार निभाया है। ये चरित्र कलाकार के नैतिक, सामाजिक व राजनीतिक चेतना व प्रतिबद्धता के कारण ही प्राणवान बन गए।
धरती के लाल जहां एक ओर बलराज के मानवीय दृष्टिकोण व उनकी मानवी आजादी के प्रति गहन आस्था की द्योतक है, दूसरी ओर इस फिल्म ने एक नई प्रवृत्ति का सूत्रपात किया जिसका विकास व अभिवृद्धि विमल राय व सत्यजीत राय ने किया और भारतीय सिनेमा को विश्व सिनेमा के इतिहास में एक सम्मानजनक स्थान दिलवाया।
धरती के लाल (1946) अब्बास का निर्देशन के रूप में पहला प्रयास था। बिजोन भट्टाचार्य के नाटक नवना व कृष्णचंदर की कहानी अन्नदाता पर आधारित इस फिल्म की कहानी अब्बास व बिजोन भट्टाचार्य ने लिखी। इसके गीत लिखे सरदार जाफरी और पे्रम धवन ने। यह पहली भारतीय फिल्म है जिसे सोवियत यूनियन में व्यापक रूप से 1949 में वितरण किया गया। यह फिल्म 1943 के बंगाल के अकाल पर एक कठोर व्यंग्य है। और साथ ही अकाल पीडि़त मानवों का हा-हाकार व अमानवीयकरण का सजीव दस्तावेज के रूप में मील के पत्थर के रूप में हमेशा याद की जाएगी।
'धरती के लाल' फिल्म का एक दृश्य 
दो बीघा जमीन (1953) जिसे विमल राय ने निर्देशित किया। भारतीय सिने इतिहास में एक महान क्लासिकल फिल्म के रूप में सदैव याद की जाएगी। इस फिल्म के नायक के रूप में बलराज की अभिनय कला उच्चतम शिखर तक पहुंची। इस चरित्र का गहन यथार्थ चित्रण करने के लिए बलराज ने मुंबई में जोगेश्वरी में रहने वाले उत्तर प्रदेश के मेहनतकश लोग जो दूध बेचने का कार्य करते थे के जीवनशैली का गहराई से अध्ययन किया। इस फिल्म का जो भाग कोलकाता के रिक्शे चालकों के जीवन चित्रण से संबंधित था बलराज ने स्वयं कोलकाता की सड़कों पर रिक्शा चलाया। इस अभ्यास के दौरान एक रिक्शा चालक बलराज के पास पहुंचा और पूछा, ”बाबू! यहां क्या हो रहा है?” बलराज ने उसे दो बीघा जमीन की कहानी सुनाई। उसकी आंखों में आंसू आ गए और बोला, ”यह मेरी कहानी है।” उसकी आंखों से अश्रुधार बहने लगी। बिहार में उसके पास दो बीघा जमीन थी जो उसने 15 साल पहले जमींदार के पास गिरवी रखी थी और उस जमीन को जमींदार से छुड़ाने के लिए वह कोलकाता में दिन-रात रिक्शा चला रहा है। और उसका शरीर क्राशकाय हो गया था। पर जमीन को जमींदार के कब्जे से छुड़ाने की आशा बहुत कम थी। उस रिक्शा चालक की दारुण-कथा को सुनकर बलराज भावतिरेक में डूब गए और मन ही मन कहने लगे, ”मुझसे भाग्यवान व्यक्ति कौन होगा, जो विश्व के एक लाचार व निस्सहाय व्यक्ति की कहानी सुना रहा है… मुझे पूर्ण शक्ति से अपना कर्तव्य करना चाहिए। तब मैंने इस अधेड़ रिक्शा चालक की अंतर्रात्मा को आत्मसात किया और अभिनय की कला को भूल गया… और अंतत: अभिनय के बुनियादी सिद्धांत किसी पुस्तक से नहीं मिले पर जीवन से।”
लगभग दो दशाब्दी बाद एम.एस. सत्थ्यू द्वारा निर्देशित फिल्म गर्म हवा जहां उनकी अभिनय कला की महानता का एक और उदाहरण है, वहीं यह फिल्म एक विश्व क्लासिक के रूप में बार-बार प्रदर्शित की जाती है। इस फिल्म का केंद्रीय चरित्र लखनऊ का एक मुस्लिम व्यापारी है जो भारत विभाजन की त्रासदी का शिकार है और घोर आंतरिक द्वंद्व से जूझ रहा है। उसके अधिकांश रिस्तेदार पाकिस्तान चले गए हैं।
'गर्म हवा' फिल्म का एक दृश्य 
इस फिल्म में एक अत्यंत हृदयग्राही दृश्य है। मुस्लिम व्यापारी की लड़की आत्महत्या करती है। दिल्ली के एक रंगकर्मी जिसने इस फिल्म के प्रोडक्शन में काम किया, यह दृश्य कई बार शूट किया। यह दृश्य कला व जीवन के अंतर्संबंधों की जटिलता को दिखाता है। बलराज की प्रिय बेटी शबनम ने आत्महत्या का प्रयास किया और बाद में मानसिक बीमारी के कारण उसकी मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु से बलराज टूट गए। यहां फिल्म में बलराज का चरित्र अपनी बेटी, जिसने अपने हाथ की नाड़ी काटकर आत्महत्या की, के मृत्यु शरीर को देख रहा है। कला व जीवन के इस अद्वितीय अंतर्संबंधों ने एक ऐसे दारुण दृश्य की संरचना की जो अविस्मरणीय है।
बलराज एक मात्र कलाकार ही नहीं थे, वे लेखक भी थे। वे कहानी, जिसे उनके भाई भीष्म साहनी संपादन करते थे, लिखते थे। इप्टा के कलाकार होने के नाते वे जन संघर्षों में शामिल होते थे। इसी कारण आसिफ की फिल्म हलचल की शूटिंग के समय उन्हें गिरफ्तार किया गया और आसिफ ने कोर्ट से विशेष आज्ञा लेकर अपनी शूटिंग पूरी करवाई। इस दौरान बलराज पुलिस एस्कोर्ट में रहे।
आज जब हम उनकी 100वीं जन्मतिथि मना रहे हैं, इस अद्वितीय कलाकार, जो कलाकार से पहले एक इंसान था, संघर्षरत जनता का साथी रहा और मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत था, हम उनका क्रांतिकारी अभिवादन करते हैं।
साभार: समयांतर

लोकतंत्र का अर्थ बदलने लगा है: संजय कॉक


डाक्यूमेंटरी फिल्मकार संजय काक से उनकी नवीनतम फिल्म माटी के लाल (रेड एंट ड्रीम) के बहाने आज के राजनैतिक और सामाजिक मुद्दों पर जितेन्द्र कुमार की बातचीत..
संजय कॉक 
‘माटी के लाल’ फिल्म देश के विभिन्न हिस्सों में चल रही राजनीतिक उथल-पुथल को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है। हालांकि यह प्रश्न थोड़ा अटपटा है, फिर भी मैं पूछना चाहता हूं कि ‘माटी के लाल’ फिल्म का आइडिया आपके दिमाग में कैसे आया, अनायास या आपकी लंबी तैयारी का हिस्सा था?

कुछ सालों से मध्य भारत खासकर बस्तर, छत्तीसगढ़ में जो चल रहा है उसे देखकर कुछ लोगों को लगता है कि यह अपने आप ही हवा में पैदा हो गया है। इसका कोई इतिहास नहीं है। अखबारों में देखकर और सुनकर ऐसा लगता है कि माओवादी इन जंगलों में आए और बगावत शुरू हो गई या ज्यादा से ज्यादा कुछ सोच लिया तो कह देंगे कि इनका नेपाल के माओवादियों से कोई रिश्ता है! तो बात वहां से शुरू हुई कि भारत में क्रांतिकारी संभावनाएं कहां से पैदा होती हैं या क्रांति का इतिहास भारत में कहां से शुरू होता है। हम पाते हैं कि क्रांति की बात इस देश में 1947 से शुरू नहीं होती है, बल्कि उससे पहले भी इसकी बात होती रही है। 1947 के बाद हर साल किसी न किसी रूप में इस पर बात होती रही है। इसलिए जब लोग कहते हैं कि यह फिल्म क्रांतिकारी संभावनाओं पर एक दस्तावेज है, तो संभवत: इसलिए कि हमारी कोशिश यह थी कि हम कुछ ऐसी चीजों को जोड़ें जो हमें यह समझने में मदद करें कि इस देश में क्रांति की संभावना की बात सिर्फ माओवादियों के हाथ में ही नहीं है, बल्कि जो लोग उड़ीसा के नियमगिरी में खनन के खिलाफलड़ रहे हैं वो भी अपने को क्रांतिकारी कहते हैं, और जो पंजाब में मजदूरों-किसानों के साथ लड़ रहे हैं वो भी अपने को क्रांतिकारी कहते हैं। इसलिए इस फिल्म में उस इतिहास को दोहराने की बात नहीं थी, बल्कि क्रांति की संभावना तलाशने की एक कोशिश थी कि वो क्या है, उसके सूत्र क्या हैं।
आपने 1995-96 में एक फिल्म बनाई थी ‘वन वीपन’ (एकलौता हथियार), जिसमें वोट डालने में ही लोगों को अपनी सारी समस्याओं का समाधान दिखता है, उसके बाद 1999 में नर्मदा घाटी में चल रहे संघर्ष पर ‘पानी पे लिखा’ (वर्ड्स ऑन वाटर) फिल्म बनाई और 2006-07 में ‘जश्न-ए-आजादी’, जो कश्मीर के बारे में है। ‘माटी के लाल’ (रेड एंट ड्रीम) जो इस सीरीज की चौथी फिल्म है, इन में आपस में कहीं न कहीं कोई तार जुड़ा हुआ है?
आप बिल्कुल सही समझ रहे हैं, वन वीपन 25-30 मिनट की छोटी सी फिल्म थी, जो कॉलेज के विद्यार्थियों को बताने के लिए बनाई गई थी और लोकतंत्र इसकी विषयवस्तु थी। यह फिल्म आजादी की 50वीं वर्षगांठ पर बनाने के लिए दी गई थी। इसे दो राज्यों-तमिलनाडु और पंजाब के दलित एक्टिविस्टों से चुनाव से पहले और बाद में बात करने के बाद बनाया गया था। फिल्म बनाने के दौरान पता चला कि लोकतंत्र का अर्थ बदलने लगा है या फिर बदलवाया जा रहा है। उस दौरान मुझे यह भी समझने में मदद मिली कि लोगों और राजसत्ता के बीच रिश्ता क्या है, लोगों की समस्याओं की सुनवाई कहां होती है। जिसे हम लोकतंत्र कहते हैं उसमें लोगों की बात सुनी जाती है या नहीं? जब हमने 1999-2000 में वर्ड्स ऑन वाटर (पानी पे लिखा) बनाई तो मेरी समझ से वह फिल्म कहीं भी बन सकती थी। मणिपुर में बन सकती थी, कश्मीर में बन सकती थी या फिर कहीं और भी बन सकती थी। लेकिन नर्मदा को हमने इसलिए चुना, क्योंकि उसका एक लंबा इतिहास था, बहुत ही साफ बातें कह रहे थे वे लोग। आंदोलनकारियों के तर्क स्पष्ट थे, क्योंकि वे लोग अहिंसक तरीके से अपनी बात कह रहे थे। इसलिए मुझे लगता था कि जब कहीं हिंसा हो रही होती है और बंदूक का प्रयोग हो रहा होता है तो तात्कालिक रूप से उन मसलों का आकलन करना मुश्किल हो जाता है। हिंसा का प्रभाव काफी ज्यादा होता है। इसलिए मैंने सोचा कि नर्मदा घाटी में जो हो रहा है, उसे ही देखा जाए। घाटी में लंबे समय से संघर्ष चल रहा था, सुप्रीम कोर्ट का सात-आठ साल के बाद फैसला आया था बांध के खिलाफ और फिर से बांध बनने लगा। जिस तरह वहां के लोगों की नैतिक और सैद्धांतिक लड़ाई को सरकार ने उठाकर बाहर फेंक दिया और खासकर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से, तो उसे जबर्दस्त नुकसान हुआ। तब मुझे लगा कि अपने काम के क्षेत्र का विस्तार किया जाना चाहिए। 2002 में पानी पे लिखा बनाने के बाद मैं कश्मीर गया और जश्न ए आजादी बनाई। उसका इसके साथ संबंध तो है, क्योंकि मुझे लगने लगा आखिर जिसे हम लोकतांत्रिक अधिकार कहते हैं वह क्या सिर्फ नई दिल्ली तक आसपास के दो तीन जिलों तक सीमित है या सचमुच देश में पूरे देश में लोकतंत्र है। मेरे लिए यह फिल्म इसी लोकतंत्र की तलाश के बारे में है। इस लोकतंत्र में जो एक क्रांतिकारी लहर शुरू से रही है और जो लोग अपने को क्रांतिकारी कहते हैं, उनका लोकतंत्र में विश्वास नहीं है। लेकिन यह भी हो सकता है कि वे लोकतंत्र को दूसरी नजर से देखते हों। इसलिए जब फिल्म बननी शुरू हुई थी तो मैंने कोई नक्शा बनाकर किसी भी फिल्म पर काम नहीं शुरू किया था, लेकिन मेरी चारों फिल्में, खासकर लंबी फिल्में पानी पे लिखा, जश्न-ए-आजादी और माटी के लाल, वे हैं तो लोकतंत्र के बारे में ही, पर वे आपस में जुड़ गई हैं।
अगर इन चारों फिल्मों के संदर्भ में हिंदुस्तान को आप कहां पाते हैं। क्या कहीं भी ‘इंडिया शाइनिंग’ या ‘इंक्रीडेबल इंडिया’ की कोई झलक मिलती है?
मैं कभी इन फिल्मों को मायूसी की नजर से नहीं देखता हूं, क्योंकि कभी-कभी ऐसा लगता है कि जब हम चीजों को बारीकी से देखते हैं तो महसूस होता है कि यह तो आलोचना है। लेकिन मैं समझता हूं कि लोकतंत्र की योजना (प्रोजेक्ट) 1947 में नहीं आयी और ऐसा भी नहीं है कि 1947 के बाद लोकतंत्र पूरी तरह आ गया। मेरी समझ से लोकतंत्र की योजना काफी लंबी है या कहिए कि यह ‘वर्क इन प्रोग्रेस’ (सतत चलता काम) है। मुझे लगता है कि हम सबकी यह जिम्मेदारी है कि हम हर दिन उस पर नजर रखें और किसी को हमला न करने दें। इसलिए मुझे लगता है कि जो भी संघर्ष चल रहे हैं, उन्हें ही मैं ‘इंक्रीडेबल इंडिया’ मानता हूं। जब आप फिल्म बना रहे होते हैं तो उन लोगों के साथ आपको रहने का अवसर भी मिलता है और जैसे वे जी रहे हैं और जो वे कर रहे हैं, उसे देखने का भी। मेरे हिसाब से ‘शाइनिंग इंडिया’ भी वही है।
सरकार की विनाशकारी नीतियों का विरोध करने और नक्सलियों के प्रति सहानुभूति भी रखने वाले कई लोगों का कहना है कि आपने छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को हथियार से लैस दिखाकर उनकी प्रशासन के सामने पहचान करवा दी, जो उनके लिए खतरा साबित हो सकता है। क्या इससे आपको बचना नहीं चाहिए था?

देखिए, सरकार और कॉरपोरेटाइज मीडिया इस बात से सहमत होंगे कि छत्तीसगढ़ के जो आदिवासी हैं और लडऩे वाले हैं उनके बारे में किसी को कुछ पता न चले, उनकी शक्लें न दिखें, वे जीते-जागते लोग हैं या फिर हैवान हैं उनकी तस्वीर नहीं दिखनी चाहिए वे बिना शक्ल के होने चाहिए, जो बीच-बीच में निकलकर किसी नेता को अगवा कर लेते हैं, पुलिस बल पर आक्रमण कर देते हैं। उनकी शक्ल न दिखाना और उनकी पहचान छुपाना माइथॉलॉजी को बढ़ावा देना है। क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि जिन्होंने बंदूकें उठा ली हैं, चाहे वे कश्मीर में हैं या फिर बस्तर में, आखिर वे लोग कौन हैं और वे चाहते क्या हैं? हो सकता है कि जिन्होंने बंदूकें उठा ली हैं उन्होंने बहुत सोच-समझकर यह निर्णय लिया हो। यह भी हो सकता है कि वे बहुत तार्किक लोग हों और उनकी राजनीति हमसे ज्यादा विकसित हो। जब तक हम उनसे अवगत नहीं होंगे, खासकर फिल्मों में, मुझे लगता है यह ठीक नहीं हैं। अगर हम बस्तर में पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी को फिल्म में 15-20 मिनट तक उनकी तस्वीर देखते हैं या फिर उन्हें भूमकाल में नाचते हुए देखते हैं, तो मैं समझता हूं कि यह फिल्म का बहुत जरूरी पहलू है। जो आदमी पीएलजीए या वर्दी पहन लेता है या जो महिलाएं अपने बाल कटवा लेती हैं या फिर जो युवक सौ रुपए की सस्ती-सी डिजीटल घड़ी पहन लेता है, जो उन्हें पार्टी की तरफ से मिलती है, तो समझ लीजिए कि उन्होंने सबसे पहले अपनी मौत चुन ली है। इसलिए जब मैं जंगल में गया तो हमसे उनके सीनियर कॉमरेड ने खुद कहा कि आप जिसे चाहें फिल्मा सकते हैं, जबकि हमने तब तक अपना कैमरा भी नहीं निकाला था। उन्होंने कहा कि आप फिल्म में किसको नहीं दिखाएंगे, यह मैं खुद बता दूंगा। वह सीनियर कॉमरेड यह इसलिए नहीं कह रहे थे कि वे कुछ सीनियर कॉमरेड को नहीं दिखाना चाहते थे या सिर्फ जूनियर कॉमरेड को ही दिखाना चाहते थे। उनका कहना था कि कुछ लोगों को इसलिए नहीं दिखाइए क्योंकि वे कभी-कभी सामान लाने बाहर जाते हैं और उनकी पहचान हो सकती है। इसलिए ये जो बहस है और आपका ये सवाल भी मेरे सामने कोई पहली बार नहीं आया है, बल्कि यह मध्यमवर्गीय चिंता है जो पहले भी कई जगह स्क्रीनिंग में आ चुकी है। हो सकता है कि मध्यमवर्गीय चिंता (मिडिल क्लास एंक्साइटी) के चलते बंदूकधारी व्यक्तियों की बात सुनने से, हिंसा-अहिंसा के बहस से उनकी बात कहने में थोड़ी सी डगमगाहट आ जाए। लेकिन मैं इससे बिल्कुल सहमत नहीं हूं। रही बात उन्हें न दिखाने की, तो जो चाहते हैं कि उनको न दिखाया जाए, उसे कौन फिल्मकार दिखा सकता है या दिखाएगा?
फिल्म माटी के लाल में एक सीन बार-बार आता है जिसमें पंजाब में कॉमरेडों का समूह नाटक करता है, जुलूस निकालता है, प्रदर्शन करता है, लेकिन गहरा संघर्ष कहीं दिखता नहीं है- भले ही वह पाश या भगत सिंह की शहादत मना रहे हों। जबकि जब हम छत्तीसगढ़ में भूमकाल का दृश्य देखते हैं, तो उसमें वास्तविक संघर्ष दिखता है। या फिर उड़ीसा के नियमगिरी की पहाडिय़ों में जो संघर्ष दिखता है वह पंजाब में नहीं दिखता है या कहिए कि ये सारी चीजें सचमुच नाटकीय लगती हैं। क्या आप भी मानते हैं कि वहां संघर्ष सिर्फ नाटकों या प्रदर्शनों तक ही रह गया है? जबकि हम अजय भारद्वाज की तीनों फिल्मों को देखते हैं तो सामाजिक स्तर पर काफी उथल-पुथल महसूस होती है, जो आपकी फिल्मों में नहीं दिखती। क्या मैं सही पढ़ रहा हूं आपकी फिल्मों को?
इसकी दो वजहें हैं। फिल्म की संरचना बस्तर और नियमगिरी में है। पंजाब को इसमें लाने की कोशिश इसलिए थी कि हम उस संघर्ष को एक रूप में देखें और दर्शकों को वहां से थोड़ा बाहर निकाला जाए। हमें लगता था कि यह पंजाब से हो सकता है। आप मानेंगे कि पंजाब में गांव तो गांव नहीं रहा है, हरित क्रांति और पूंजीवादी कृषि के चलते पूंजी का प्रवाह जैसा शहर में हुआ है वैसा ही गांव में भी है और पूरे भारत में उस मॉडल का सबसे बेहतरीन उदाहरण पंजाब है। वैसे यह अलग बात है और जो फिल्म में नहीं है कि पंजाब में किसानों का आंदोलन धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है। आपको पंजाब के बारे में अलग तरह से सोचना पड़ेगा, क्योंकि जो स्थिति नियमगिरी में है या देश के अन्य भागों में है, वह स्थिति किसानों की पंजाब में नहीं है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि वहां किसानों का आंदोलन नहीं है। अगर वहां किसी किसान की जमीन की नीलामी काकोई बैंक या सरकार नोटिस लगाती है, तो नीलामी के दिन दो-तीन हजार किसान अपने आप जमा हो जाते हैं और सरकारी अधिकारियों को वापस जाना पड़ता है। इसलिए अगर भगत सिंह या किसी के नाम पर दो-तीन हजार लोग जमा हो जाते हैं, तो इसका मतलब है कि यह किसी न किसी रूप में विचारधारात्मक प्रतिबद्धता (आइडियो-लॉजिकल कमिटमेंट) है, क्योंकि वे लोग भाड़े पर नहीं लाए गए हैं। इसलिए मैं उनके संघर्षों को कभी सांकेतिक नहीं मानता।
लोगों का कहना है कि माटी के लाल फिल्म माओवादियों पर है, जबकि नियमगिरी में पूरे आंदोलन का नेतृत्व लिंगराज कर रहे हैं जो गांधीवादी समाजवादी हैं, आपका इसके बारे में क्या कहना है?
जहां कहीं भी मैं यह फिल्म दिखाने जाता हूं तो उसको लोग इसी नजरिए से देखते हैं कि यह फिल्म माओवाद के बारे में है, तो उसमें नियमगिरी क्यों है या पंजाब क्यों है? इससे मुझे भी बहुत दिक्कत होती है, जबकि हमारी मंशा यह थी ही नहीं कि हम सिर्फ माओवाद पर फिल्म बना रहे हैं। फिल्म की कोशिश यही थी कि हमारे लिए जिस तरह की लड़ाई लिंगराज आजाद और नियमगिरी सुरक्षा समिति वाले उड़ीसा में लड़ रहे हैं, उतनी ही अहमियत उनकी भी है जो बस्तर में लड़ रहे हैं। जिस तरह का मोबलाइजेशन पंजाब में संस्कृति के इर्द-गिर्द किया जा रहा है, माओवादियों ने वही सांस्कृतिक मोबलाइजेशन बस्तर में किया है। फिल्म का एक उद्देश्य यह था कि हम सिर्फ एक तरह के संघर्ष को पहचान न मानें। हम इतने जटिल समय में हैं कि पंजाब का पांच या दस एकड़ जमीन वाला संपन्न किसान भी अपने को लडऩेवाला मानता है और नियमगिरी के आदिवासी भी अलग तरह से संघर्ष कर रहे हैं। दोनों के संघर्ष एक से नहीं हो सकते हैं, लेकिन इस ‘बायोडावर्सिटी ऑफ रेजिस्टेंस’ में भी एक क्रांतिकारी संभावना का तार है। लोग चाहते हैं, जो स्थिति है इसको धीरे-धीरे सुधारें नहीं बल्कि बदलाब लाने की कोशिश करें, क्योंकि असली क्रांति तो बदलाव ही है और इसी के लिए कोशिश करनी है।
फिल्म पानी पे लिखा और माटी के लाल में नियमगिरी में जो संघर्ष है, वह पूरी तरह अहिंसक है। लोगबाग सचमुच अहिंसक हैं और फिल्म को देखें तो पुलिस के अलावा किसी के पास कोई हथियार नहीं हैं, लेकिन सरकार और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल कोई भी नुमाइंदा उनकी एक भी बात मानने को तैयार नहीं है, तो क्या आपको लगता है कि उनके पास हिंसा के अलावा और कोई रास्ता बच जाता है?
आपके पहले सवाल के जवाब में मैंने कहा था कि यह फिल्म लोकतंत्र के बारे में है। लोगों को याद होगा कि कश्मीर में पहली बार लोगों ने 1989-90 में हथियार उठाए थे। लोगों ने बीसियों साल से लोकतांत्रिक ढंग से अपनी बात कहनी चाही थी, लेकिन उनकी कोई बात नहीं सुनी गई और फिर स्थिति ऐसी बनी कि जब लोगों ने हथियार उठा लिए तो अब आपको पता है कि हालात क्या हैं। नर्मदा घाटी की लड़ाई हो या नियमगिरी की, कोर्ट के जरिए या डंडे के जरिए अगर आप लोगों की बातों की अवहेलना करेंगे या फिर उड़ीसा में ही पॉस्को के खिलाफ या टाटा के खिलाफ कलिंगनगर में चल रहे संघर्ष हैं, तो हम जानते हैं कि लोग वहां जी-जान से उसका जबर्दस्त विरोध कर रहे हैं। हर तरह से उन्हें बाहर करना चाह रहे हैं, लेकिन जब आप उनकी बात नहीं सुनेंगे, उन्हें रौंद देंगे और डंडे की बदौलत लोगों का विनाश करेंगे तो फिर 10-15 सालों के बाद अगर वही लोग या फिर उनमें से कुछ लोग हथियार उठा लेते हैं और हिंसक संघर्ष के लिए तैयार हो जाते हैं तो यह हम सबकी जिम्मेदारी बन जाती है। लेकिन कॉरपोरेट मीडिया और सरकार उसे इस रूप में पेश करते हैं कि यह लड़ाई हिंसा और अहिंसा के बारे में है, जबकि बात लोकतंत्र को बचाने और लोकतंत्र को खत्म करने की होनी चाहिए।
कुछ लोगों का आरोप है कि आप जैसे लोगों को भारतीय लोकतंत्र में सिर्फ बुराई ही नजर आती है, जबकि इस साल को छोड़ दीजिए तो जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) इतना अच्छा रहा है, भारत इतना विकास कर रहा है, लेकिन आपको कुछ भी अच्छा नहीं दिखता है?
अगर जीडीपी ही पैमाना है, तो भारत सचमुच विकास कर रहा है। चीन को देखें। वहां बहुत विकास हो रहा है और विकास के इस दौर में नदियां, पहाड़, जंगल और प्रजा… सबको बर्बाद कर दिया गया है और आने वाले सौ वर्षों तक पूरा देश इसके दुष्परिणाम भोगता रहेगा। इस 10-20 साल में जिसे हम विकास काल मानते हैं, सोचना चाहिए कि उसका इतना विरोध क्यों हो रहा है। पंजाब में हरित क्रांति के बाद क्यों लोग सड़क पर आ रहे हैं। दूसरी ओर दिल्ली में एसी बसें हैं, मेट्रो है और पॉश कॉलोनियां में जन सुविधाएं भी हैं, लेकिन अगर दिल्ली में ही हाशिए के लोगों को देखें तो पता चलेगा कि हालात क्या हैं। अगर जीडीपी की बात करें तो कापसहेड़ा और मानेसर के लोगों को भी देखा जाना चाहिए, जिनका जीडीपी बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योगदान है। लेकिन दो-दो शिफ्ट में काम करने के बाद भी उनके हाथ छह-सात हजार रुपए से अधिक नहीं आता है। आखिर स्थिति इतनी भयावह क्यों है? हर हाथ में मोबाइल को सोशल इंडिकेटर (सामाजिक समृद्धि का संकेतक)का पैमाना नहीं मान सकते। इसका असली पैमाना यह होगा कि बच्चों में मृत्यु दर कितनी कम हुई है, पहले से कितने कम लोग भूखे पेट सोते हैं, और ये सब देखें तो आपको पता चलेगा कि हालात बहुत ही खराब हैं।
जब एनडीए की सरकार थी तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात काफी जोर-शोर से उठाई गई थी और आप लोगों ने फिल्म्स फॉर फ्रीडम के नाम से एक बहुत ही सार्थक कार्यक्रम भी चलाया था, लेकिन जब यूपीए की सरकार आई तो यह कार्यक्रम लगभग या पूरी तरह थम सा गया। क्या आप या आपलोग सचमुच यह मानते हैं कि समस्या सिर्फ एनडीए के समय ही थी और यूपीए के आने के बाद सबकुछ ठीक हो गया या फिर आपलोग ही शिथिल पड़ गए। वास्तव में वक्त बदला है या चीजें यथावत हैं?
आपका सवाल काफी बढिय़ा है। देखिए, भाजपा और कांग्रेस के बीच अंतर तो बहुत हैं। अगर भाजपा के शासनकाल में उनकी बात नहीं मानी जाती थी, तो अपने गुंडों को भेजकर तोडफ़ोड़ करवा देते थे, मारपीट पर उतर आते थे, लेकिन कांग्रेस बहुत ही चालाक पार्टी है, उसके पास शासन करने का लंबा इतिहास है। यूपीए और कांग्रेस की नीति बाजार से संचालित है, इसलिए ये सेंसरबोर्ड, गुंडागर्दी या सीधे बदमाशी के जरिए काम नहीं करती, बल्कि बाजार के जरिए भी उनका बहुत काम हो जाता है। आप देखेंगे कि मास मीडिया या टेलीविजन पर सेंसरशिप नहीं है, लेकिन क्या कारण है कि उन मुद्दों पर वहां पूरी तरह चुप्पी है जिनपर सरकार चाहती है? इसलिए बाजार के जरिए भी बहुत से काम हो जाते हैं और सीधे सेंसर की जरूरत भी नहीं पड़ती। रही बात फिल्ममेकर्स के कंपैन की, तो कंपैन तो कंपैन की तरह ही होना चाहिए। इसे पेशा नहीं बनाना चाहिए। लेकिन इस कंपैन का काफी असर हुआ है। देश के विभिन्न हिस्सों में प्रतिरोध के सिनेमा के बैनर तले छोटे-छोटे फिल्म फेस्टिवल होने लगे हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश के कई शहरों में लगातार फिल्में दिखाई जा रही हैं और जब हम इसकी तुलना करें तो दुनिया के किसी कोने में इस तरह फिल्में अभी नहीं दिखाई जा रही हैं, यह बड़ी उपलब्घि है।
आपको फिल्म बनाते हुए तीस साल से अधिक हो गए, क्या कुछ बदला है?
अस्सी के दशक में जब मैं यूनिवर्सिटी से निकला तब से बहुत कुछ बदला है फिल्ममेकिंग के क्षेत्र में…
मैं टेक्नोलॉजी की बात नहीं कर रहा हूं…?
देखिए, जो बदला है वो टेक्नोलॉजी से अछूता नहीं है। क्योंकि उस वक्त जो फिल्में बनती थीं, तो वही लोग होते थे देखने वालों में जो फिल्म बनाते थे। साल में दस-बीस फिल्में बनती थीं और सब एक-दूसरे को जानते थे। अब कोई फिल्म बनती है, तो अगर तीन सौ लोगों की क्षमता वाला ऑडिटोरियम है तो वह पूरी तरह भर जाता है। डिस्ट्रीब्यूशन काफी आसान हो गया है। खरीददार बढ़ गए हैं, तो कुल मिलाकर मेरा मानना है कि काफी कुछ बदला है और ज्यादातर चीजें तकनीक के आसान होने से हुई हैं। छोटे प्रोजेक्टर लेकर किसी भी जगह को आप स्क्रीनिंग स्पेस में तब्दील कर सकते हैं।
वैसे यह सवाल काफी मूर्खता भरा है, फिर भी मैं पूछ रहा हूं कि क्या डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाकर जिंदगी जी जा सकती है?
नहीं, बिल्कुल नहीं। जब कोई व्यक्ति यह पूछने आता है कि इसमें मैं कैरियर बनाना चाहता हूं, तो मेरा स्पष्ट जवाब होता है कि नहीं, इसमें कैरियर तो कतई नहीं है। अच्छी डॉक्यूमेंट्री जुनून से बनती है और कैसे बनती है, इसे सब लोग जानते भी नहीं हैं। जब हम अपने सहयोगियों की फिल्म देखने जाते हैं और फिल्म खत्म होने के बाद क्रेडिट लाइन देखते हैं, तब पता चलता है कि उनको सपोर्ट कहां से मिला है। फिर भी अच्छी फिल्में बन रही हैं और वे लोग बना रहे हैं जिनके पास मीडियम की समझदारी है, लेकिन वे बहुत संपन्न नहीं हैं, पर काम महत्त्वपूर्ण कर रहे हैं। डॉक्यूमेंट्री फिल्म कैरियर तो नहीं है और शायद इसी ने इसे बचाकर रखा है।
क्या डॉक्यूमेंट्री फिल्म एक कल्चरल प्रोडक्ट के रूप में अब भारत में अपने आप जीवित रह सकता है। जबकि हिंदी फिल्मों का इतना बड़ा बाजार है और खरीददार भी हैं, डॉक्यूमेंट्री फिल्म का कोई बाजार बन पाया है?
बिल्कुल, पहले एक छोटा तबका था जो इस तरह की फिल्में देखता था। मैं अक्सर कहता हूं कि इसे देखना और दिखाना संगीत की तरह है। बहुत लोगों ने इस पर मेहनत की है और उनकी मेहनत का ही यह परिणाम है कि अब पैसा भी आने लगा है। पहले जब हम फिल्म दिखाते थे, तो फिल्म के अंत में दो लोग आते थे कि क्या इस फिल्म की वीएचएस कॉपी मिल जाएगी, लेकिन जब आज आप किसी फिल्म की स्क्रीनिंग करें तो गारंटी मानिए कि अगर बाहर आपके डीवीडी पड़े हों तो सौ कापी तो जरूर बिक जाएंगी। इसलिए अब जब दर्शक देखने आते हैं, तो वे अपने पॉकेट में पैसे लेकर आते हैं और देखने के बाद खरीदते भी हैं, जो पहले बिल्कुल नहीं था।
साभार: समयांतर 
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