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गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

मेरी कॉम: एक मॅग्नीफिसेन्ट पंच जमाने के जबड़ों पर!

उसके हाथ कांपते हैं मगर थमते नहीं! वह खुद से और अपनी परिस्थितियों से लगातार लड़ती है. अपने और पिता के बीच के रिश्ते से, कोच की नाराज़गी से, फेडरेशन पॉलिटिक्स से, परिवार की परेशानियों से, नॉर्थ-ईस्ट की आबो-हवा से और इन सब से ज्यादा खुद के एक महिला होने से. क्योंकि आज यह सामाजिक, मानसिक और शारीरिक रूप से मान लिया गया एक रुखा सच है! 

लेकिन यहीं से शुरू होती है पांच बार की वर्ल्ड चैम्पियन मेरी कॉम की असल कहानी. मणिपुर की राजधानी इम्फ़ाल से क़रीब 60 किलोमीटर दूर कंगाथाई कबायली ‘कॉम’ जाति के 32 परिवारों के एक छोटे से गांव में रहने वाली लड़की की कहानी. जो इम्फ़ाल के अपने स्कूल तक जाने के लिए साइकिल सफर करने के लिए तैयार हो पर किसी भी हार के लिए नहीं. है न एक दम फिल्मी! 

ऐसी दर्जनों बातें हैं जो आपको एक दम फिल्मी लग सकती हैं पर मैरी के लिये यह कड़वी सच्चाई थी. मैरी ने अपनी ज़िन्दगी से जुड़ी ऐसी बातों का जिक्र ‘अनब्रेकेबल’ नाम की ऑटोबायोग्राफी में बहुत बेबाकी और ईमानदारी से किया है. जो उन्हें ‘मॅग्नीफिसेन्ट’ बनाता है.

फिल्म मेरी कॉम की कहानी भी कुछ बेहद कठिन परिस्थितियों से शुरू होती है. जब मेरी अपने जुड़वां बच्चों की प्रेगनेंसी के कारण सबसे मुश्किल परिस्थितियों से रूबरू रहती हैं. लेकिन जब आपका जुनून अपने हालात को पटखनी देने पर आमादा हो तो मैरी वह सबकुछ पाते हैं जो मणिपुर की उबड़-खाबड़ पहाड़ियों को पार करके हासिल होती हैं.

तभी तो दमखम और पुरुषों के अधिपत्य वाले खेल में मैरी अपने जुनून के दम पर वह स्थान पाती है जो देश के पुरुषों ने भी कभी नहीं पाया. मेरी कॉम के जुनून को आप उनके द्वारा ऑपरेशन थिएटर के टेबल पर डॉक्टर से किये रियेक्ट से समझ सकते हैं. जब वह बेहोशी के आलम में पूछती हैं कि “सिज़ेरियन के बाद मैं बॉक्सिंग कर पाऊंगी न?”

जो भी हो फिल्म का पहला भाग जहां युवा मेरी के संघर्ष और अपने सपनों को पाने की कहानी कहता है वहीं फिल्म का दूसरा भाग स्त्री जीवन की सबसे कड़वी सामाजिक हकीकत को धीरे-धीरे नुमाया करता है. जब मैरी फुटबाल कोच ऑनलर के प्रेम निवेदन से शादी तक का सफर तय कर चुकी होती है. वह भी अपने ‘कोच सर’ के विचारों के खिलाफ. यहां मेरी स्त्री स्वतन्त्रता और उससे जुड़े फैसलों से बाहर आकर नई स्त्री की परिधि गढ़ती हैं. लेकिन इसके अपने खतरे भी हैं. जब अपने भीतर की बेचैन लड़की जिसका महत्वाकांक्षी होना उसकी शख्सियत का सबसे खराब पहलू माना जाता है, प्यार में पड़ी हुई औरत जिसे घर उतनी ही शिद्दत से चाहिए जितनी शिद्दत से मेडल चाहिए, एक मां जो अपने करियर के सबसे अहम मुकाम पर अपनी सबसे बड़ी फैमिली क्राइसिस भी झेल रही होती है, वो भी परिवार से दूर रहकर. 

यहीं से शुरू होती है एक अनसुलझी परिस्थितियों की दास्तां. जहां पति-पत्नी की जिम्मेदारियों संग बाप-बेटी के तल्ख रिश्तों के अलावा, एक महिला शरीर द्वारा अपने बच्चों को पाने के एवज में दी गयी कुर्बानियों की इबारत भी साथ गुंथी-बुनी होती है. जबकि खेल-फेडरेशनो से जुड़ी, टुच्ची पॉलिटिक्स की संढाध अलग दम घोंट रही होती है. ऐसे में मैरी के पति ऑनलर एक मजबूत साथी के किरदार में उभरते हैं. ऑनलर एक सच्चे दोस्त और हमसफर दोनों ही रूप में मेरी कॉम को बैक स्टेज से अपना कन्धा देते हैं. जो भारतीय पुरुषों के लिए भी एक सबक है. जो मेरी को एक बार फिर बॉक्सिंग की दुनिया में लौटने में जरूरी मदद साबित होता है. यानी मैरी अपनी सेकेण्ड इनिंग में भी चैम्पियन बन कर वापसी करती है. जो आज भी जारी है. ठीक वैसे ही जैसे इंचियोन में हो रहे 17वें एशियाड में मेरी कॉम अपनी राउन्ड्स में जीत दर्ज कर रही हैं.



मेरी, प्रियंका और फिल्म


निर्माता संजय लीला भंसाली और उमंग कुमार की मेरी के किरदार के लिए प्रियंका चोपड़ा को साईन करने पर बहुत आलोचना हुई थी. लोग फिल्म में मणिपुरी एक्ट्रेस को देखना चाहते थे. ग्लैमरस प्रियंका चोपड़ा जैसी हीरोईन भला सीधी-सादी मेरी कॉम की तरह दिख भी कैसे सकती है? लेकिन फिल्म में प्रियंका चोपड़ा ने अपने अभिनय से सबकी बोलती बंद कर दी है. 

मनाली की वादियों में कम-बैक की तैयारी करती मेरी कॉम के रूप में प्रियंका का शरीर वाकई किसी फाइटर का शरीर लगता है. पूरी फिल्म में प्रियंका के चेहरे पर भाव आते-जाते रहते हैं. एक पल के लिए भी उनकी आंखें खुद से अलग नहीं होने देतीं. जिद्द, जोश और जुनून से लरबरेज उनकी आंखें कभी-कभी कमजोर भी दिखती हैं लेकिन अपने चेहरे में मैरी के चेहरे को बड़ी सहजता से घुला-मिला लेती हैं. वहीं दर्शन कुमार, रॉबिन दास और सुनील थापा अपने-अपने किरदारों को बहुत आसानी से जीते दिखे. . पर फिल्म के संवाद कई जगह बेहद ढीले जान पड़ते हैं. बावजूद इसके कि फिल्म के कई हिस्सों में मेरी का किरदार अपने संवाद से मजबूत बन कर उभरता है. वैसे प्रोडक्शन डिज़ाईनर और आर्ट डायरेक्टर रहे चुके फिल्म निर्देशक उमंग अपने काम में बेहतर जान पड़ते हैं, खास कर डिटेलिंग में. क्योंकि फिल्म का एक भी हिस्सा मणिपुर में नहीं शूट हुआ है, लेकिन फिल्म में सबकुछ मणिपुर सा लगता है. मैरी के मां-बाप इमा और इपा की पोशाकें, कोच सर का बदहाल जिम, ट्रेनिंग सेंटर और यहां तक की फिल्म की पूरी आबो-हवा.


‘मेरी’ को अभी इससे भी लड़ना है! 


किसी भी भाषा में बनी फिल्म अच्छी या बुरी हो सकती हैं. इसका मूल्यांकन फिल्म के गुण-दोष पर होना चाहिए, भाषा पर नहीं. लेकिन यह भी सच है कि भाषा और संस्कृतियों का अलगाव बहुत पुराना रहा है! कुछ ऐसे ही कारणों से मणिपुर के लोग अपनी माटी में जन्मी मेरी कॉम की फिल्म को नहीं देख पाये क्योंकि पिछले 14 साल से उग्रवादी गुटों ने मणिपुर में हिंदी फिल्मों पर प्रतिबंध लगा रखा है. ये संगठन मानते हैं कि उनकी संस्कृति को हिंदी फ़िल्में ख़राब करती हैं.

मणिपुर में यह हालात हमेशा नहीं थे. यहां हिंदी फिल्में और गाने, दोनों ही बेहद पसंद किये जाते थे. आज से लगभग तीस साल पहले की फिल्म ‘डिस्को डांसर’ का गाना यहां काफी लोकप्रिय रहा है. मणिपुर में अंतिम बार जो हिंदी फिल्म सिनेमाघर में लगी थी, वह संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘हम दिल दे चुके सनम’ थी. ऐसा नहीं है कि मणिपुर से बॉलीवुड का रिश्ता नहीं रहा है. मणिपुर की अभिनेत्री सुरजा बाला हिजाम तीस से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुकी हैं. लेकिन जो काम फिल्म मेरी कॉम ने किया है वह अभी तक देश का नेतृत्व भी नहीं कर पाया था. 

पर इसका प्रभाव और भी ज्यादा हो सकता था. मेरी कॉम में जो भूमिका अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने निभायी है, वह पहले मणिपुर की अभिनेत्री लिन लैशरम को निभानी थी. वह तीरंदाजी के जूनियर वर्ग में राष्ट्रीय चैंपियन रह चुकी हैं. विदेश में पढ़ी हैं. उन्होंने हिंदी फिल्म ‘ओम शांति ओम’ में छोटी सी भूमिका भी अदा की थी. बाद में तय हुआ कि मेरी कॉम की भूमिका प्रियंका चोपड़ा ही निभायेंगी. इस फैसले पर कई नजरिये हो सकते हैं. अगर प्रियंका चोपड़ा के बजाये यह फिल्म लिन लैशरम को मिलती तो हो सकता था, मणिपुर और शेष भारत में कोई ऐसी खिड़की खुल जाने की गुन्जाइश बनती जिससे सौहार्द और एकजुटता की हवा बेधड़क हो कर आ-जा सकती. 

खैर, आज फिल्में कला माध्यम से ज्यादा कार्पोरेट कल्चर से गहरे जुड़ी हैं. जो उसे बाजार के बावस्ता चलने पर मजबूर करती है. लेकिन बॉलीवुड को आज टेक्नोलॉजी के साथ-साथ सुचना-क्रांति की राजनीति भी हॉलीवुड से सिखने की जरुरत है. क्योंकि आज देश को मनोरंजन और फायदों से ज्यादा, बहुत-कुछ और की भी जरुरत है.

-अमृत सागर 


रूबरू दुनिया  के 'द फिल्मास्टिक' कॉलम से-

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

हैदर: चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले!

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले
चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले

क़फ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो

कहीं तो बह्र-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

हैदर के अब्बा डाक्साहब जब-जब फैज के ज़िंदाँ-नामा को गुनगुनाते हैं फिल्म हैदर देखने वालों की सांसे 'झेलम' हो जाती हैं! जो आज सिर्फ और सिर्फ सुर्ख धसकती 'लाल' रेत से अटी पड़ी है. जिससे निजात की बेकार कोशिश में नायिका अर्शी(श्रद्धा कपूर) को अलीगढ़ से लौटे नायक से कहना पड़ता है कि 'ये(फौजी) जानते ही नहीं कि तुम मिलटेंट नहीं पोएट' हो!
शायद! तभी 'हैदर' फिल्म से ज्यादा एक कविता सी लगती है! जो हैदर की जुबान पर पहले हाफ तक सिर्फ चुप्पी की हिजाब ओढ़े मिलती है तो दुसरे हाफ में अचानक से चल जाने वाली क्लास्निकोव की गोली!

जैसे उस आवाज को सुनकर उसकी अम्मी जान गजाला(तब्बू) डाक्साहब से पूछ रही हों कि 'किस तरफ हैं आप'? जबकि इस बात का जवाब दोनों ही जानते थे कि 'जब दो हाथी लड़ते हैं तो सबसे ज्यादा घास ही मसली जाती है.' लेकिन होता सबकुछ वैसा ही है! जिसका डर फिल्म के शुरू होने के पहले ही आपके ज़ेहन में पेवस्त हो चुका होता है! यानी शेक्सपियर का 'हेमलेट'...
अपने चचा खुर्रम(मेनन) के राजनीतिक गिलाफों के कारण 'ब्रिटिश भारत के क्रांतिकारी उर्दू कवियों' पर शोध करने वाला एक पोएट, मिलटेंट बन जाता है! क्योंकि दोनों ही कश्मीर में आज 'ऊपर खुदा है और नीचे फौज!' बस इस हाड़ कंपाती, जहरीली हवाओं को कोई थामता है तो वह है अर्शी और हैदर का इश्क जो पूरी फिल्म में सफ़ेद बर्फ के साथ देते हुए शुरूआत से अंत तक सरमायेदार रहती है.

 
फिल्म विशाल भारद्वाज के नजरिये से दशकों से मसली जाती कश्मीरी आवाम की एक दहकती मगर अधूरी कहानी कहती है! जो 'मैं हूं कि मैं नहीं' के सवाल में लगातार उलझती जा रही है! और गैर कश्मीरी दर्शक फिल्म के एक दृश्य पर खुद सवाल होने को मजबूर हो जाते है! जब फिल्म में रूह्तास(इरफान) अपने घर के बाहर ठिठके बाशिंदे को उसके ही घर में तलाशी लेकर घुसाता हैं, यह कहते हुए कि 'कश्मीर में लोग तलाशी के इतने आदी हो गए हैं कि अपने घर में भी बिना तलाशी, घुसने में डरते हैं.' और हैरत से मुंह खुला-खुला रहा जाता है जब एक मां अपने बेटे को पढने भेजने के लिए अपने सर पर बंदूक रख लेती है. ओह! खौफ और कश्मीर! 
बशारत पीर और विशाल का साथ एक ऐसी पटकथा को जन्म दे गया है जिसको देखने के बाद आप घंटों तक कुछ-कुछ सोचते रहेंगे पर निश्चित ही कश्मीर की तरह. आपके हाथ कोई ओर-छोर नहीं आता! क्योंकि आज दर्शन और कश्मीर के दरीचों से यथार्थ और मौत वैसे ही झांकती है! जैसे जन्नत की वादियों में 'हाफ विडोज' जो तब तक 'पूरी' नहीं होती जब तक अपने शौहर या उसकी बॉडी को नहीं देख लेती! जबकि वादी में गायब हुए हजारों कश्मीरियों के लिए यह लगभग नामुमकिन है!

शायद तभी यह फिल्म वादियों को एक ऐसे नजरिये से देखने का मौका देती है जिसे सीधी आँखों से नहीं देखा
जा सकता! क्योंकि पूरा 'कश्मीर एक कैदखाना हो चूका है! पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से निपटने के लिए भारत सरकार के प्रायोजित चरमपंथ को भी फ़िल्म ने बड़े बेबाक तरीके से उठाया है. ठीक वैसे ही जैसे फिल्म में सलमान के प्रशंसक दोनो 'सलमांस' अपनी असल भूमिका में पूरी तरह एक सामान्य असलहों की तरह क्रूर होते हैं. जो शुरू में थोडा हास्य पैदा करते हैं पर असल में वह मुखबीर होते हैं. ठीक वैसा ही एक और प्रयोग फिल्म के विमर्श को एक नई ऊंचाई देता है!  अफ्सपा (आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट) की तर्ज पर गढ़ा गया 'चुत्जपा' जो एक दुस्साहसी विरोध दर्ज कराने जैसा होता है! सरकारी एक्ट पर ऐसा तंज शायद ही किसी बॉलिवुड की फिल्म में दिखा हो!

खैर! कुछ दृश्यों को छोड़कर वादी की सिनेमेटोग्राफी भी फिल्म के संगीत की तर्ज पर अचम्भित करती है. थियेटर के तर्ज पर रचा गया 'बिस्मिल' गाना आपको अपने नृत्य शैली और मेटाफर से एक सर्द एहसास से भर देता है. तो वहीं 'झेलम', 'खुल कभी तो' और 'दो जहाँ' अपने बोलों के साथ अपने संगीत से निरुत्तर कर देते हैं.

शेक्सपियर के हेमलेट के लिए बस इतना ही कि अगर भारत में यह कहीं भी उकेरी जाने की हक़दार है तो वह
निश्चित ही कश्मीर है! सिर्फ कश्मीर!

जिसके दरीचों में फैज की लाइने सर्द हवाओं सी दाखिल होती हैं_____ और सनसनाती हैं!


_हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूँ की तलब

गिरह में लेके गिरेबाँ का तार तार चले___चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले!


- अमृत सागर 

रविवार, 28 सितंबर 2014

मैं हूँ और रहूंगी !

जीवन के सभी क्षेत्रों में ‘क्वीन’ बन चुकी स्त्रियाँ अब लाइफ के ‘हाइवे’ पर अकेलेदम चलने वाली “मर्दानी” के किरदार में हैं– वह आज खुलकर कहती हैं.. मैं हूँ और रहूंगी !


भले यह महज एक संयोग हो कि इक्कीसवीं सदी की स्त्री को रेखांकित करती फिल्म क्वीन में कंगना रनौत जिस किरदार को जी रहीं थीं उसका नाम भी ‘रानी’ था और उसके कुछ महीनों बाद ही एक और ‘रानी’ को ध्यान में रखकर इंडस्ट्री का सबसे बड़ा प्रोडक्शन हॉउस यशराज बैनर; अपनी ही बनाई लीक तोड़कर फिल्म बनाता है- मर्दानी. हम इस बातचीत में ‘हाइवे’ की ‘वीरा’(आलिया भट्ट) को भी शामिल कर सकते हैं. जिसके मुख्य किरदार का नाम भी ‘वीर’ शब्द का स्त्री संस्करण सा लगता है. लेकिन हो-हल्ला मर्दानी नाम पर ज्यादा हुआ. जिसका कारण मर्द से बना मर्दानी शब्द है. संभवतः मर्दानी शब्द का सबसे पहला प्रयोग शुभद्रा कुमारी चौहान ने रानी लक्ष्मी बाई के लिए लिखे काव्य ‘खुब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली...’ में किया था. इस काव्य में भी एक रानी के लिए ही मर्दानी शब्द का प्रयोग किया गया जाता है. 

शायद! तभी ऐसी फिल्मों के रिलीज होते ही विमर्शों के खाँचें खोल दिये जातें हैं और ‘मर्दानी’ के हवाले से यह मान लिया जाता है कि स्त्री इस ज़माने में भी मर्द जमात के पूर्वाग्रहों से आजाद नहीं हो सकती. यह विमर्शों की मार्केटिंग है. पर यह भी सच है कि आज के दौर में भी विमर्शों के सभी कारक और कारण खुद को बाहुबली समझने वाले पुरुष जमात के पास ही है. तभी तो ‘हाइवे’ का महाबीर(रणदीप हुड्डा) हो या क्वीन फिल्म की रानी का मंगेतर विजय(राजकुमार राव); दोनों फिल्मों में कहानी की शुरुआत और कसावट; पुरुष अस्तित्व के सहारे ही आगे बढती है. लेकिन मर्दानी को छोड़ अन्य दो फिल्मों में एक बात समान है कि नाम से लेकर वैचारिक विरोध की पृष्ठभूमि तक मर्दों के इर्दगिर्द ही बुनी गयी है. कारण ‘क्वीन’ जैसा शब्द भी ‘किंग’ के अस्तित्व की पुरजोर पुष्टि करता है. पर मर्दानी के कथानक में परजीविता नहीं स्वअस्तित्व की अनुभूति ज्यादा स्पष्ट होती है. ‘मर्दानी’ की कहानी स्त्री के अपने अस्तित्व से कहीं समझौता नहीं करती. बल्कि देह व्यापार की परतों में सबसे भीतरी तहों को खोलती हुई एक भोथरी सच्चाई से हमें रू-ब-रू कराती है. 

सेक्स के रॉ मटेरियल के लिए यूज किये जाना वाला भारत हर आठ मिनट पर अपनी एक बच्ची या युवती को लापता होते देखता है. निर्देशक प्रदीप सरकार ने इस इश्यू को ध्यान में रखकर गोपी पुथरन की कहानी पर 'मर्दानी' बनाई है लेकिन फिल्म के हर मोड़ पर स्त्री के बदलते स्वरूप को बेहद बारीकी से सपोर्टिंग इफेक्ट्स की तरह मर्ज किया गया है. जहाँ वह कहती है ‘मैं हूँ और रहूंगी’.

दरअसल, मर्दानी में सिर्फ चोर-पुलिस का खेल ही नहीं है बल्कि बैकग्राउंड में गर्ल-चाइल्ड ट्रैफिकिंग को भी बैकबोन की तरह स्थिर रखा गया है. जिसके इर्द-गिर्द अपने पति और भतीजी के साथ रहने वाली क्राइम ब्रांच की सीनियर इंस्पेक्टर शिवानी रॉय(रानी मुखर्जी) अपनी लड़ाई लड़ती है. वह निडर है, गालियां बकती है यहां तक कि उसमें मुम्बईया फिल्मी हीरोज के सभी अतिरिक्त गुण भी हैं.

फिल्म में रानी मुखर्जी ने एक इंस्पेक्टर का किरदार पूरे आत्मविश्वास के साथ निभाया है. उनके अभिनय में कहीं भी हड़बड़ी नहीं दिखाई देती. एक्शन सीन में जरूर वे थोड़ी कमतर दिखती हैं लेकिन उसका कारण भी पुरुष मानसिकता से गढ़ी गयी यह मानसिक दुनिया है. जहां महिलाएं महज एक सपोर्टिंग एक्टर हैं. क्योंकि समाज में मर्दों की तरह देह रखना सिर्फ पुरुषों का अधिकार है. जिसके दम पर वह हमेशा स्त्रियों को कमसिन और खुबसूरत की परिभाषा में बांधे रखते हैं. इसके अलावा फिल्म का बाकी हिस्सा सिर्फ कहानी को कहने के लिए मोड़ भर हैं.

विलेन के रूप में ताहिर राज भसीन ने रानी को जबरदस्त टक्कर दी है. फिल्म में वे खून-खराबा करते या चीखते हुए नजर नहीं आते, बावजूद इसके वे अपने अभिनय से खौफ कायम करने में कामयाब रहे. शायद निर्देशक ने फिल्म के पिछले दरवाजे से यह स्पष्ट किया है कि असल में सामाजिक परिवेश के विलेनों में आज बहुत बड़ा बदलाव आ चुका है. वह मासूम और सफ़ेदपोश दिखता है. वह अच्छे कपड़े पहनता है और माडर्न दिखता है. पर वह इरादों में बेहद खुंखार है. इसे भी यह फिल्म बेपर्दा करती है. 



 क्वीन से ज्यादा मर्दानी! 


पिछली सदी के शुरूआती दशकों में रूस के समाजवादी क्रांति के बाद से नारियों को असल अधिकार मिलने शुरू हुए. इंगलेंड जैसे देश ने अपने यहाँ की स्त्रियों को वोटिंग का अधिकार 1925 में दिया वहीं फ्रांस में यह अधिकार 1944 में दिया गया. स्विट्जरलेंड जैसे देश में यह अधिकार 1971 में मिला. अपने देश में आज़ादी के बाद संविधान के लागू होते ही महिलाओं को समान अधिकार दिए गये पर हकीकत जरा कागजी है.

शायद! सामाजिक परतंत्रता की कई ग्रंथियां होती हैं और स्वतंत्रता व स्वाधीनता के लिए उन सभी को खोलना पड़ता है. कौन सी ग्रंथि पहले खुलती है यह परिवेश पर निर्भर करता है. भारत की स्थितियां इस मामले में बेहद जटिल हैं.

पिछले दिनों आयी फिल्म ‘क्वीन’ नारी वर्ग की शादी से जुड़ी ग्रंथियों को आजाद करती है. जिसमें नायिका अपने मंगेतर के शादी से महज दो दिनों पहले रिश्ता तोड़ देने के बावजूद हनीमून पर विदेश जाने के लिए निकल जाती है लेकिन उसके बाद ‘आजादी’ से रू-ब-रू हुई नायिका अपने मंगेतर के वापस लौटने के बाद भी वापिस नहीं लौटती. जैसे ठीक ‘हाइवे’ की वीरा करती है. अपने सेफजोन को एक झटके में तोड़ फेंकती है और अपने पारिवारिक ग्रंथी से आजादी का रास्ता लेती है.

तभी तो कई बार सिर्फ सफर में ही मजा आता है. जहां से हम चले थे वहां वापस नहीं जाना चाहते और न ही किसी मंजिल तक, ऐसा लगता है कि सफर कभी खत्म ही न हो. आज स्त्रियाँ हाइवे की वीरा की तरह उसी सफ़र पर है. अंतर बस इतना है कि वह अपने सफ़र पर ‘क्वीन’ से ज्यादा ‘मर्दानी’ बनकर रहना चाहती हैं.

-अमृत सागर

(यह समीक्षात्मक लेख रूबरू दुनिया में प्रकाशित हो चुका है!)
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